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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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८४ रसखान-ग्रन्थावली रसखान ने जिस प्रकार कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन किया है, उसी प्रकार राधा के सौन्दर्य के भी अनेक चित्र चित्रित किये है । राधा के नेत्रो मे वह सुन्दरता तथा मादकता है, मानो ब्रह्मा ने ससार को प्यासा जानकर उसकी तृप्ति के लिए उनके नेत्रो मे सुधा-सागर भर दिया है। मुख इतना सुन्दर है जैसे अपने समस्त अमृत-सार को सजोकर चन्द्रमा स्वय उपस्थित हो गया हो । उसके शरीर का गठन ऐसा है जैसे सोने मे म णिमुक्ताओ को जड़ने के लिए कुशल जड़िया यौवन ने रत्न जटने के लिए स्थान-स्थान पर सुन्दर स्थान निर्धा- रित किये हुए हो। उसके अधरो की लाली काम-कामना के समान सुशोभित है। उसकी नासिका का छिद्र उस भौरे के समान है जिसमे पड़कर ज्ञान की नौका का गर्व नष्ट हो जाता है और उसकी मनोहर चिबुक पर तो सैकड़ो रति और रम्भा की शोभा को न्योछावर किया जा सकता है— 'कैधो रसखान रस कोम दृग प्यास जानि, आनि कै पियूप कूप कीन्हौ विधि चंद घर । कैधो मनि मानिक बैठारिबै को कंचन मै, जड़िग्या जोवन जिन गढ़िया सुघर घर । कैधौ काम कामना के रंगत अधर चिन्ह, कैधौ यह भौर ज्ञान वोहित गुमान हर । एरी मेरी प्यारी द्युति कोटि रति रम्भा की, वारि डारौ तेरी चित्तचोरनि चिबुक पर ॥' राधा का मुख इतना सुन्दर है कि उसकी सुन्दरता का किसी भी प्रकार वर्णन नही किया जा सकता । उसका सौन्दर्य प्रकाशित करने वाला है । उसके रूप का बोध वही व्यक्ति कर सकता है जिसने नक्षत्रों की अनुपम शोभा को देखा है । उसके मस्तक पर लगा हुआ टीका इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानो चन्द्रमा अपनी गोद मे मगल को लिये हुए हो — 'श्री मुख कौ न बखान सकै वृषभान सुता जू को रूप उजारो । हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझनहारो । चारु सिन्दूर को लाल रसाल लसै ब्रज बाल को भाल टिकारो । गोद मे मानौं विराजत है घनश्याम के सारे की सारे को सारो ॥'