रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ८३ 'तैं न लख्यो जब कुंजनि तें बनिर्क निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ उठ कैसो किरीट लसै लटक्यौ री । को रसखानि फिटै फटक्यौ हटक्यौ ब्रजलोग फिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरि वा नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ।।' जितना मधुर कृष्ण का शरीरगत सौन्दर्य है, उतना ही आकर्षक उनका चेष्टागत सौन्दर्य भी है । उनके वक्र नेत्रो की मार इतनी पैनी और प्रभावशाली है कि जिस गोपी पर भी वह पड जाती है, वह अपनापन भूल जाती है और क्षणभर को भी कृष्ण-स्मृति को नही छोड़ पाती— 'नैननि बक बिसाल के बाननि झेलि सकै अरु कौन नवेली । बेधत हैं हिम तीक्ष्न कोर सुमार गिरी तिय कोटिक हेली । छोडै नही छिनहूँ रसखानि सु लागी फिरै द्रुम सो जनु बेली । रोरि परी छबि की ब्रजमंडल कुंडल गंडनि कु तल केली ।।' कृष्ण की वाणी और उनकी चंचल दृष्टि विलक्षण है । उनके कपोलो पर कुंडलो की छवि हाथी के गडस्थल पर पड़ी हुई छवि की भाँति अद्वितीय है । जब वे वृक्ष की डाली पकड़कर त्रिभंगिमा से खडे होते हैं तो उस समय उनकी जो शोभा होती है, उसका वर्णन नही किया जा सकता । उनकी सरस मुस्कान तो वशीकरण मत्र है ही— 'अलबेली विलोकन बोलनि औ अलबेलियै लोल निहारन को । अलबेली सी डोलनि गडनि पै छवि सों मिलि कु डल बारन की । भटू ठाढौ लख्यो छवि कैसे कहौ रसखानि गहे द्रुम डारन को । हिय मैं जिय मैं मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ।।' उनके विशाल नेत्र सुख देने वाले हैं, उनके कपोल पुष्ट हैं, वाणी मे माधुर्य है, हँसी मे आकर्षण है, मुख मे चन्द्रमा जैसी सुन्दरता ओर स्निग्धता है । इस सौन्दर्य-राशि को देखकर सभी गोपियाँ इसकी मनोहरता पर मोहित हो जाती है— 'बाँकी बडी अँखियां बडरारे कपोलनि बोलनि की कल वानी । सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी । ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी । डोलति है बन बीथिन मे रसखानि मनोहर रूप लुभानी ।।'