रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ रसखान-ग्रन्थावली साहित्य मे—केवल नायिका के सौन्दर्य का ही वर्णन किया गया है। यह वर्णन एकागी है। रसखान ने नायक और नायिका—कृष्ण और राधा—दोनो के सौन्दर्य का वर्णन किया है। कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए इन्होंने बताया है कि उस नटवर कृष्ण के गले में मोतियों की माला पडी हुई है। उनकी घूंघरवारी केश-राशि लटक रही है। अंग के प्रत्येक भाग मे जड़ाऊ आभूषण और सिर पर जरी वाली पगडो सुशोभित है। ऐसे सौन्दर्य के दर्शन पूर्ण पुण्यो के कारण ही हुआ करते हैं— 'मोतिन माल बनी नट के लटकी लटवा लट घूँघरवारी । अग ही अग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी । पूरब पुन्यनि तें रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झाँके झरोखे मैं बाँके विहारी ॥' कृष्ण जब शाम को गाय चराकर अपने अन्य साथियो के साथ वन से वापिस लौटते है तो उस समय उनका जो सौन्दर्य होता है, उसे देखकर ब्रज की वनिताएँ अपने सारे दिन की थकान को भूल जाती है— 'आवत हैं वन तें मनमोहन गाइन संग लसै ब्रज-ग्वाला । वेनु बजावत गावत गीत अभीत इतैं करिगो कछु ख्याल । हेरत हेरि कहै चहू ओर तें झाँकि झरोखन तें ब्रज-बाला । देखि सु आनन को रसखानि तज्यो सब द्योस को ताप-कसाला ॥' कृष्ण जितने सुन्दर है, उनकी वाणी में उतना ही माधुर्य है और कुंजो मे घूमने फिरने की उतनी ही आकर्षणमयी आतुरता है। जो भी गोपी उनके सौन्दर्य को तथा उनकी सुन्दर चेष्टाओ को देख लेती है, वह उनके सौन्दर्य- सागर मे डूबे बिना नही रह पाती — 'अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गांठन खोलत है । सुन री सजनी अजबेलो लला वह कुंजनि कु जनि डोलत है । रसखानि लखें मन वूड़ि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है ॥' जो भी गोपी कृष्ण के सौन्दर्य को देख लेतो है, वह दीवानी बन जाती है, कृष्ण का सौन्दर्य उसके हृदय मे अटक जाता है—