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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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: ६ : - रसखान की रस-योजना रस काव्य की आत्मा है, अतः प्रत्येक सजीव काव्य के लिए रस-योजना अनिवार्य है। भावपूर्ण कवियो के काव्य मे रस-योजना श्रमसाध्य नही होती, वरन् स्वाभाविक होती है। विविध रसो की योजना रसखान का ध्येय नही है। ये तो भक्त है और भक्ति के आवेश मे आकर ही इनकी वाणी फूटी है। इनकी भक्ति माधुर्य भाव की है। अतः श्रृंगार रस की योजना ही इनके काव्य मे पाई जाती है। भक्त होने के नाते इनकी इस श्रृंगारिक योजना को अलौ- किक श्रृंगार के अन्तर्गत ही परिगणित किया जायेगा। श्रृंगार रस के दो भेद होते है—सयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार । इन्हे ही क्रमशः सम्भोग श्रृंगार और विप्रलम्भ श्रृंगार कहते है। संयोग श्रृंगार सयोग श्रृंगार के अन्तर्गत नायक और नायिका के मिलन की अवस्था एवं तज्जन्य आनन्द का वर्णन होता है। यह मिलन-अवस्था एकदम नही आती, बल्कि इसे प्राप्त करने के लिए दोनो को अनेक सोपान पार करन पड़ते है। पहले वे अचानक मिलते हैं, एक-दूसरे को देखते है और पारस्परिक रूप का लावण्य उन्हे सान्निध्य प्राप्त करने को प्रेरित करता है। तत्पश्चात् उन दोनो की प्रेम-क्रीडाएँ चलती है। सयोग श्रृंगार के अन्तर्गत मुख्यतया तीन बातो का वर्णन किया जाता है— १ रूप-वणन । २ प्रेम-व्यापार का वर्णन । ३ नायिका-भेद-वर्णन । १. रूप-वर्णन रूप अथवा सौन्दर्य के प्रति आकर्षण प्रेम का प्रथम सोपान है। नायक नायिका के सौन्दर्य से और नायिका नायक के सौन्दर्य के कारण ही दोनो एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। हिन्दी मे विशेषत. रीतिकालीन