भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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८० रसखान-ग्रन्थावली

भी इनके मन मे श्रद्धा भाव है । शिव की स्तुति करते हुए ये कहते हैं— 'यह देखि धतूरे के पात चबात तौ गात सो धूलि लगावत हैं । चहुँ ओर जटा अटकै लटकै फनि सो कफनी फहरावत हैं । रसखानि जेई चितवै चित दै तिनके दुख-दुन्द भजावत हैं । गज-खाल कपाल की माल विसाल सो गाल बजावत आवत हैं ॥' गंगा-महिमा से सम्बद्ध इनके दो सवैये उपलब्ध हैं । वे ये हैं— १. 'इक ओर किरीट लसै दूसरी दिसि नागन के गन गाजत री । मुरली मधुरी धुनि अधिक ओठ पै अधिक नाद से बाजत री । रसखानि पीतम्बर एक कँधा पर एक बघम्बर राजत री । कोउ देखउ सगम लै बुड़की निकसे यहि भेख सो छाजत री ॥' २. 'वेद की औषध खाई कछु न करै बहु सजम री मुनि मोसे । तो जल-पान कियो रसखानि सजीवनि जानि लियो रस तोसे । ऐ री सुधामई भागीरथी नित पथ्य अपथ्य बनै तोहि पोसे । आक धतूरो चबात फिरै विष खात फिरै शिव तेरे भरोसे ॥' इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि रसखान वल्लभाचार्य की परम्परा में आते हैं, पर ये इस परम्परा के भक्तो की भांति नियमो का कठोर पालन करके नहीं चले हैं । नियमो की अपेक्षा इनकी भक्ति पद्धति भावो पर अधिक आधृत है । यही कारण है कि इनके मन मे जितनी कृष्ण के प्रति आस्था है, उतनी ही अन्य देवताओ के प्रति विशेषतः गंगा और शिव के प्रति । उदार मन की यह उदारता रसखान के अतिरिक्त न तो अन्य कृष्ण-भक्तो मे मिलती है और न स्वच्छन्दवादी कवियो मे ।