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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ७६ 'कंचन-मंदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाय सदा झलकयैत । प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत । जद्यपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत । ऐसे भए तौ कहा रसखानि जो साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत ॥' ✕ ✕ ✕ ✕ 'कहा रसखानि सुखसम्पत्ति सुमार कहा, कहा तन जोगी ह्वै लगाए अंग छार को । कहा साधे पंचानल कहा सोए बीच जल, कहा जीति लाए राज सिन्धु आर-पार को । जप बार बार तप सगम बयार व्रत, तीरथ हजार अरे बूझत लवार को । कीन्हौ नही प्यार नही सैयौ दरबार चित, चाह्यो न निहार्यो जो पै नन्द के कुमार को ॥' ✕ ✕ ✕ ✕ 'कंचन के मंदिरनि दीठि ठहराति नाहिं, सदा दीपमाल लाल मानिक उजारे सो । और प्रभुताई अब कहाँ लौ बखानौ, प्रति, हारन की भीर भूप हटत न द्वारे सो । गंगाजी मैं न्हाइ मुक्ताहलहू लुटाइ, वेद, बीस बार गाई ध्यान कीजत सबारे सो । ऐसे ही भए तौ नर कहा रसखानि जो पै, चित्त दै न कीनी प्रीति पीतपटवारे सो ॥' इन उद्धरणो से यह स्पष्ट हो जाता है कि रसखान के मन में अपने आराध्य के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण, विश्वास एवं अनुराग है । किन्तु अन्य कृष्ण-भक्तो की भाँति इनका हृदय सकीर्ण नही है । सूरदास कृष्ण को छोडकर अन्य देव की उपासना इसी प्रकार हास्यास्पद समझते है जिस प्रकार कामधेनु को छोड- कर छेरी का दूध निकालना । पर रसखान मे यह सकीर्णता नही है । ये यद्यपि कृष्ण के प्रति अपनी पूर्ण आस्था प्रकट करते है, पर शिव और गंगा के प्रति

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