रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ रसखान-ग्रन्थावली जो नंद की गायो के साथ विचरण कर सके । यदि पाषाण-योनि मिले तो उसी पर्वत की शिला वनूँ जिसे कृष्ण ने इन्द्र का गर्व खंडित करने के लिए अपने हाथ से उठाया था और यदि पक्षी बनूँ तो मुझे यमुना-तट पर उगे हुए कदम्ब- वृक्षो पर निवास करने का अवसर मिले - 'मानुष हों तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौ तौ बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन ।।' इसी प्रकार ये अपने शरीरावयवो की सार्थकता इस बात मे मानते है कि वे आराध्यदेव के काम आये - 'जो रसना रस ना बिलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै-कुँज कुटीरन देहु वुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका-अंग-सवारन । खास निवास मिलै जु पै तो वही कालिन्दी-कूल कदंव की डारन ।।' और— वैन वही उनको गुन गाइ और कान वही उन वैन सो सानी । हाथ वही उन गात सरै अरु पाप वही जु वही अनुजानी । जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी । त्यौं रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ।। उस आराध्यदेव के समक्ष दुनिया का सारा वैभव तुच्छ और निस्सार है । कोई व्यक्ति चाहे जितना वैभव सचित कर ले, यदि उसकी कृष्ण मे भक्ति नहीं है तो उसके सचित वैभव का कोई मूल्य नही, क्योकि कृष्ण की भक्ति ही सर्वोच्च और सत्य वैभव है— 'संपति सौ सकुचाइ कुबेरहिं रूप सौ दीनी चिनौती अनंगहि । भोग कै कै ललचाइ पुरन्दर जोग कै गग लई घर मगहि । ऐसे भए तौ कहा रसखानि रसै रसना जौ जु मुक्ति-तरंगहि । पै चित ताके न रग रच्यौ जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रंगहि ॥' × × × ×