रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ७७
संभव भी नही था । यथा — 'बाल गुलाब के नीर उसीर सो पीर न जाइ हिये जिन ढारौ । कंज की माल करौ जु बिछावन होत कहा पुनि चंदन गारौ । एते इलाज बिकाज करौ रसखान कों काहे को जारै पै जारौ । चाहति हौ जु जिबायौ पटू तो दिखावौ बडी बडी आँखिनवारौ ॥' इस सवैया मे हृदय की सहज भावनाएँ मुखरित है । विरहिणी के विरह का सच्चा इलाज यही है कि उसका प्रियतम उसे मिल जाये । अन्यथा अन्य इतर उपचारो मे कोई लाभ नही है । इसलिए तो विरहिणी अपनी सखी से कहती है कि मेरे हृदय पर गुलाबजल और खस छिड़कना बेकार है । कज- माला का बिछावन करने मे तथा चंदन का लेप करने से भी कोई लाभ नही है । ये सारे उपचार व्यर्थ है, वरन् ये तो मेरी पीडा को, जलन को, और भी अधिक बढाते है । हे सखि ! यदि तुम मुझे जीवित रखना चाहती हो तो मुझे विशाल नेत्र वाले कृष्ण का दर्शन करा दो । यही एकमात्र उपचार मेरे विरह- रोग को ठीक कर सकता है । माधुर्य भक्ति का तीसरा प्रमुख अंग है पूर्णतया आत्मसमर्पण । जब तक भक्त स्वयं को अपने अराध्य के प्रति पूर्णतया समर्पित नही कर देगा, तब तक उसका उसके प्रति प्रेम और विश्वास अधूरा ही रहेगा । रसखान को अपने अपराध्य पर पूर्ण विश्वास है । उसके सरक्षण मे ये सब प्रकार के दुखो से तथा कष्टो से स्वय को सुरक्षित समझते है— 'कहा करै रसखानि को, कोऊ चुगुल लबार । जो पै राखनहार है, माखनचाखनहार ॥' इसलिए इनका मन कृष्ण के लिए चातक बना हुआ है — 'विमल सरस रसखानि मिलि, भई सकल रसखानि । सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥' अपने अराध्य के प्रति इनका इतना घनिष्ठ स्नेह है कि ये युग-युगान्त तक उसका सान्निध्य प्राप्त करना चाहते है । इनकी इच्छा है कि यदि मुझे आगामी जन्म मे मनुष्य-योनि मिले तो मैं व वही मनुष्य बनूं जिसे ब्रज और गोकुल के ग्वालों के मध्य खेलने का अवसर मिले । यदि पशु-योनि मिले तो उस गाय का