रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ रसखान-ग्रन्थावली 'फूलत फूल सबै वन बागन बोलत भौर बसंत के आवत । कोयल की किलकार मुनै सब कंत बिदेसन ते सब आवत । ऐसे कठोर महा रसखान जू नेकहु मोरी ये पीर न पावत । हूक सी सालन है हिय मैं जब वैरिन कोयल कूक सुनावत ॥ वियोग के कारण विरहिणी के शरीर की द्युति मन्द पड गई है । उसका कमल जैसा कोमल मुख भी मुरझा गया है । उसक हृदय की साँसे लपट बन- कर जलने लगी हैं । ऐसे ही अवसर पर जब उसे यह सूचना मिलती है कि उसका प्रियतम आ गया है तो उसकी क्षीण होती हुई शरीर द्युति इस प्रकार दमक उठती है मानो दिये की बाती उकसा दी हो — 'रसखान सुनाह वियोग के ताप मलीन महा दुति देह तिया की । पंकज सी मुख गौ मुरझाय लगी लपटै वरै स्वास हिमा की । ऐसे मे आवत कान्ह सुने हुलसै सुतनी तरकी अँगिया की । यो जग जोति उठी तन की उकसाय दई मनो बाती दिया की ॥' विरह वर्णन मे कही-कही रसखान परम्परा से इतने जडीभूत हो गये है कि भावलोक की क्षति का ध्यान भी भूल गये है और परम्परा के अवाध प्रवाह मे वह गये है । यथा— 'बिरहा की जु आँच लगी तन मे तब जाय परी जमुना जल मे । विरहानल तँ जल सूखि गयौ मछली वही छांड़ि गई तल मे । जब रेत फटी रु पताल गई तब शेष जर्यो धरती-तल मे । रसखान तबै इहि आँच मिटै जब आय कै स्याम लगे गल मे ॥' अर्थात् जब विरहिणी के शरीर मे वियोग-दुख की अग्नि वढ गई तो वह उसे शान्त करने के लिए यमुना के जल मे कूद गई । तब विरह की आग के कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के अभाव के कारण यमुना के तल मे बैठ गई । उस आग के कारण जब यमुना का जल अत्यन्त गरम हो गया तो उसकी गरमी से पाताल-लोक मे स्थित शेषनाग भी जलने लगा । रस- खान कहते है कि यह ज्वाला तभी शात हो सकती है जब कृष्ण उसके गले से आकर लगेगे । लेकिन सर्वत्र ऐसी ऊहात्मकता नही है । एक भावपूर्ण कवि के लिए यह