रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ७५ कंचुकी सेत मे जावक बिन्दु बिलोकि मरै मघवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनो रसखान सुभूत के भूप बंधूक के फूलनि ॥' २. 'बाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियां तिरछानि निया की । टांक सी लॉक भई रसखानि सुदामिनि तें दुति दूनी हिमा की । सोहै तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोबन-जोति सु यो दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥' ३. 'बासर तूँ जु कहूँ निकरै रबि को रथ मांझ अकास अरै री । रैन यहै गति है रसखानि छपाकर आँगन ते न टरै री । ओस निस्वास चल्योई करै निसिद्योस की आसन पाय करै री । तेरो न जात कछू दिन राति विचारै बटोही की बाट परै री ॥' ४ 'प्रेम-कथानि की बात चलै चमकै चित चचलता चिनगारी । लोचन बंक विलोकनि लोलनि बोलनि मै बतिया रसकारी । सोहै तरंग अनग की अगनि कोमल यौ झमकै झनकारी । पूतरी खेतत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥' ५ 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौंह गुमान हरै । दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पाँत दरै । रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधिन जाहि टरै । जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहै सब काम करै ॥' इस प्रकार रसखान ने रूप का वर्णन काफी विस्तार से किया है। माधुर्य भक्ति की सफल अभिव्यंजना के लिए यह विस्तार आवश्यक भी है। माधुर्य भक्ति का दूसरा अंग है विरह-वर्णन। रसखान ने इस अंग का भी काफी विस्तार से वर्णन किया है। सारे बागो मे फूल खिल गये है। बसन्त के आगमन के कारण भौरे उन पर गूँज रहे है। कोयल की कू-कू सुनकर सबके प्रिय विदेश से वापिस लौट चले है, लेकिन कृष्ण इतने कठोर हैं कि वे इस मादक ऋतु की तनिक भी चिन्ता नहीं करते। जब कोयल बोलती है तो कृष्ण की प्रियतमा के हृदय मे वह बरछी के समान लगती है—