रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ६१ आकुल होकर और भयभीत होकर जग गई। उसने काफी जोर लगाया कि वह स्वय को उस आलिंगन से मुक्त कर ले, पर उस सघर्ष मे उसकी चोली और फट गई। तब उसने रोष मे भरकर कृष्ण की भर्त्सना करनी शुरू कर दी। सुरत का यह वर्णन बहुत ही स्वाभाविक है। और— 'सोई हुती पिय की छतियां लगि बाल प्रवीन महा मुद मानै। केस खुले छहरै बहरै फहरै छबि देखत मैन भ्रमानै। वा रस मैं रसखानि पगी रति रैन जगी अँखियाँ अनुमानै। चन्द पै बिम्ब और विम्व पै कैरव कैरव पै मुकतान प्रमानै।।' इन विवेचन के आधार पर हम कह सकते है कि रसखान का संयोग-वर्णन पूर्ण और सफल है। रूप-प्रभाव से लेकर सुरतान्त तक के चित्रण इनके काव्य म मिलते है। वियोग-वर्णन जब किसी कारण से नायक और नायिका एक-दूसरे से दूर हो जाते है तो इम दशा को वियोग की दशा कहते है और यह दशा वियोग या विप्रलम्भ श्रृंगार के अन्तर्गत आती है। प्राय सभी कवियो ने संयोग श्रृंगार की अपेक्षा वियोग-श्रृंगार को अधिक महत्त्व दिया है। इसका कारण यह है कि सयोग की अपेक्षा वियोग में पुन स्थितियाँ अधिक व्यापक और भावुक बन जाती है। जिस प्रकार अग्नि मे तपाने पर रग मे उज्ज्वलता और परिपक्वता आती है, उसी प्रकार वियोगाग्नि मे जलकर मन के सात्विक भाव शुद्ध, परिष्कृत और परिपक्व बन जाते है। वियोग-श्रृंगार के चार भेद माने गये हैं— १. पूर्वराग २. मान ३. करुण ४. प्रवास पूर्णराग मे प्रिय के गुण-कथन अथवा श्रवणमात्र से ही उससे मिलने की इच्छा उत्कट हो जाती है और उसका अभाव खटकने लगता है। मान मे नायिका का रूठना आता है। कुछ आचार्य मान विप्रलंभ को अधिक महत्त्व नही देते।