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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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६२ रसखान-ग्रन्थावली इसका कारण यह है कि मान की स्थिति मे वस्तुत वियोग होता ही नही है, क्योकि रूठने पर भी नायक और नायिका साथ-साथ तो रहते ही है और एक दूसरे के दर्शन करते रहते है, अत यह स्थिति न तो करुण है और न प्रभाव शाली। प्रवास विप्रलम्भ तब होता है जब किसी कारण से नायक विदेश चला जाता है। किसी शाप या प्रेम-पात्र की मृत्यु के कारण जो विरह-भावना होती है, वह करुण विप्रलम्भ के अन्तर्गत आती है। इस स्थिति को भी आचार्य अधिक महत्त्व नही देते, क्योकि मृत्यु के उपरान्त तो सारा खेल ही समाप्त हो जाता है और तब सन्तोष तथा धैर्य की भावना का प्राधान्य हो जाता है। ये भावनाएँ कारुणिक भावो को जागृत करने मे बाधक है। रसखान-काव्य मे वियोग की पृथक तीन स्थितियां ही मिलती है। यथा— पूर्वराग — १ 'लोक की लाज तज्यो तबही जब देख्यो सखी व्रजचन्द सलोनो। खंजन मीन सरोजन की छवि गंजन नैन लगा दिन होनो। हेरे सम्हारि सकै रसखानि सो कौन तिया वह रूप सुठोनो। भौह कमान सो जोहन को सर वेधत प्राननि नन्द को छोनो॥' २. 'उनही के सनेहन सानी रहें उनही के जु नेह दिवानी रहें। उनही की सुनै न श्रौ बैन त्यौ सैन सो चैन अनेकन ठानी रहें। उनही सग डोलन मैं रसखानि सर्वै सुख सिन्धु अघानी रहै। उनही बिन ज्यो जलहीन ह्वै मीन सी आँखि मेरी अँसुवानी रहै॥' मान— 'प्रिय सों तुम मान कर्यौ कत नागरि आजु कहा विनहूँ सिख दीनी। ऐसे मनोहर प्रीतम के तरुनी वरुनी पग पोछै नवीनी। सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख नैननि चैन महारस भीनी। रसखानि न लागत तोहि कछू अब तेरी तिया किनहूँ मति छीनी॥' प्रवास — उपर्युक्त दोनो स्थितियो की अपेक्षा रसखान ने प्रवास-विप्रलंभ का अधिक वर्णन किया है प्रियतम के विदेश चले जाने पर बीती बातें एक एक करके विरहिणी के मस्तिष्क मे आती रहती हैं और उसे व्यथित करती रहती हैं,