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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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[Header] समीक्षा भाग ६३.

उसकी व्यथा को बढ़ाती रहती हैं। जब भी प्रिय की बाते चलती हैं, विरहिणी को बीती घटनाएँ स्मरण हो आती है— 'प्रेम कथानि की बात चलै चमकै चित चंचलता चिनगारी । लोचन बक विलोकनि लोलनि बोलनि मे बतियाँ रसकारी । सोहै तरंग अनग की अंगनि कोमल यौ झमकै झमकारी । पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥' लेकिन अब चौपड़ खेलने का अवसर कहाँ ? उसका प्रिय तो विदेश मे बैठा हुआ है। केवल स्वप्न मे ही उससे मिलन हो सकता है— 'काह कहूँ रतियाँ की कथा बतियाँ कहि आवत है न कछू री । आइ गोपाल लियो परि अंक कियौ मनभायो पियौ रस कूँ री । ताही दिना सो गडी अखियाँ रसखानि मेरे अंग-अंग मे पूरी । पै न दिखाई परै अब बावरी दै कै वियोग बिथा की मजूरी ॥' 'वियोग बिथा की मजूरी, देने वाला प्रियतम अपनी क्रूरता का संबल लेकर नायिका को सदैव तड़पाता रहता है, उसे अहर्निश व्यथित करता रहता है। नायिका का भोलापन केवल इतना था कि वह उसकी मुस्कान पर, उसकी बाँसुरी की तान पर और उसके मंजूल मुख पर स्वय को न्यौछावर कर बैठी। इससे वियोग-व्यथा भी मिली और समाज मे बदनामी भी हुई — 'वा मुसकान पै प्रान दियो जिय जान दियो वहि तान पै प्यारी । मान दियो मन मानिक के संग वा मुख मजु पै जोबन हारी । वा तन कौ रसखानि पै री तन ताहि दियो नहिं आन बिचारी । सो मुँह मोरि करी अब का कह। लाल लै आज समाज मे ख्वारी ।" कृष्ण के बिना विरहिणी ने खाना और पहनना सब कुछ छोड़ दिया है— 'मोहन सो अटक्यो मनु री कल जाते परै सोई क्यौ न बतावै । ब्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूषन भावै । देखे ते नेकु सम्हार रहै न तबै झुकि कै लखि लोग लजावै । चैन नही रसखानि दुहूँ बिधि भूली सबै न कछु र्बान आवै ॥' वियोग-शृंगार के अन्तर्गत प्रकृति का उद्दीपन रूप मे वर्णन करने की काव्यशास्त्रीय परम्परा है । रसखान ने इस परम्परा का भी पालन किया है। यथा—