रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
[Header] समीक्षा भाग ६३.
उसकी व्यथा को बढ़ाती रहती हैं। जब भी प्रिय की बाते चलती हैं, विरहिणी को बीती घटनाएँ स्मरण हो आती है— 'प्रेम कथानि की बात चलै चमकै चित चंचलता चिनगारी । लोचन बक विलोकनि लोलनि बोलनि मे बतियाँ रसकारी । सोहै तरंग अनग की अंगनि कोमल यौ झमकै झमकारी । पूतरी खेलत ही पटकी रसखानि सु चौपर खेलत प्यारी ॥' लेकिन अब चौपड़ खेलने का अवसर कहाँ ? उसका प्रिय तो विदेश मे बैठा हुआ है। केवल स्वप्न मे ही उससे मिलन हो सकता है— 'काह कहूँ रतियाँ की कथा बतियाँ कहि आवत है न कछू री । आइ गोपाल लियो परि अंक कियौ मनभायो पियौ रस कूँ री । ताही दिना सो गडी अखियाँ रसखानि मेरे अंग-अंग मे पूरी । पै न दिखाई परै अब बावरी दै कै वियोग बिथा की मजूरी ॥' 'वियोग बिथा की मजूरी, देने वाला प्रियतम अपनी क्रूरता का संबल लेकर नायिका को सदैव तड़पाता रहता है, उसे अहर्निश व्यथित करता रहता है। नायिका का भोलापन केवल इतना था कि वह उसकी मुस्कान पर, उसकी बाँसुरी की तान पर और उसके मंजूल मुख पर स्वय को न्यौछावर कर बैठी। इससे वियोग-व्यथा भी मिली और समाज मे बदनामी भी हुई — 'वा मुसकान पै प्रान दियो जिय जान दियो वहि तान पै प्यारी । मान दियो मन मानिक के संग वा मुख मजु पै जोबन हारी । वा तन कौ रसखानि पै री तन ताहि दियो नहिं आन बिचारी । सो मुँह मोरि करी अब का कह। लाल लै आज समाज मे ख्वारी ।" कृष्ण के बिना विरहिणी ने खाना और पहनना सब कुछ छोड़ दिया है— 'मोहन सो अटक्यो मनु री कल जाते परै सोई क्यौ न बतावै । ब्याकुलता निरखे बिन मूरति भागति भूख न भूषन भावै । देखे ते नेकु सम्हार रहै न तबै झुकि कै लखि लोग लजावै । चैन नही रसखानि दुहूँ बिधि भूली सबै न कछु र्बान आवै ॥' वियोग-शृंगार के अन्तर्गत प्रकृति का उद्दीपन रूप मे वर्णन करने की काव्यशास्त्रीय परम्परा है । रसखान ने इस परम्परा का भी पालन किया है। यथा—
२. सुजान रसखान: गोपी-प्रेम, रास व बाललीला सवैया
९४ रसखान-ग्रन्थावली 'फूलत फूल सबै बन बागन बोलत भोर बसंत के आवत। कोयल की किलकार सुने सब कत बिदेसन तें सब धावत। ऐसे कठोर महा रसखानि जु नेकहु मोरी ये पीर न पावत। हूक सी सालत है हिय मैं जब बैरिन कोयल कूक सुनावत॥' प्रिय का पथ देखते-देखते विरहिणी की आँखें धुँधली पड़ गई हैं। जीभ उसके गुणों को रटते-रटते थक गई है, लेकिन अभी तक प्रिय के आने का कोई सन्देश ही नही मिलता है— 'मग हेरत धूंधरे नैन भये रसना रट वा गुन गावन की। अंगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनोती चलै नहि पायन की। पथिको कोउ ऐसो जु नाहि कहै सुधि है रसखान के आवन की। मनभावन आवन सावन मैं कही औधि रही दृग बायन की॥' इस प्रकार हम देखते हैं कि रसखान के वियोग-वर्णन में स्वाभाविकता और प्रभावोत्पादकता है। लेकिन सर्वत्र ऐसा नही हुआ है। कहीं-कहीं रसखान पर रीतिकालीन जादू सर पर चढ़कर बोल उठा है। ऐसे स्थलों पर उनका वर्णन ऊहात्मक बन गया है। यथा — 'विरहा की जु आंच लगी तन में तब जाय परी जमुना जल मे। विरहानल तें जल सूखि गयो मछरी बहि छांटि गई तल मे। जब रेत फटी रु पतार गई तब सेस जरयो धरती तल मे। रसखान तबै ओह आंच मिटी जब आय के स्याम लगे गल मे॥' × × × × 'गोकुलनाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमति जू पर। बढ़ि गयो अँसुवान प्रवाह भयो जल मे ब्रजलांक तिहू पर। तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर। पूरन ब्रह्म ह्वै ध्यान रह्यो पिय औधि असैवट पात के ऊपर॥' लेकिन ऐसे स्थल कम ही हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रसखान ने अपने काव्य मे केवल एक रस की—श्रृंगार रस की—योजना की है और इसमे ये भावुकता एवं स्वाभाविकता की दृष्टि से भी और परम्परा के पालन की दृष्टि से भी पूर्णतया सफल सिद्ध हुए हैं।
: ७ : रसखान के कृष्ण भारतीय साहित्य मे कृष्ण के स्वरूप का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से होता चला आ रहा है। वैदिक साहित्य मे कृष्ण का जिस रूप मे उल्लेख हुआ है, उससे उमे न तो अवतार की संज्ञा दी जा सकती है और न देवता की ही। महाभारत मे कृष्ण के अवतारी रूप का अवश्य उल्लेख मिलता है पर इस रूप के वर्णन की सीमा कम ही है, अर्थात् इस रूप मे इनका वर्णन थोडा ही हुआ है। महाभारत के अनन्तर कृष्ण की गणना पूर्ण अवतारो मे होने लगती है। गोपाल-रूप मे उनकी उपासना की पद्धति प्रचलित करना पुराणकाल की ही देन है। हरिवंश-पुराण मे कृष्ण के स्वरूप का सबसे अधिक विस्तार और वर्णन पाया जाता है। इस पुराण मे कृष्ण के चरित को गोपियो से आबद्ध किया गया है। 'विष्णु-पर्व' के १२८ अध्यायो मे कृष्ण की जीवन-गाथा वर्णित है जिसमे कृष्ण के चरित के अनेक पहलुओ पर प्रकाश डाला गया है। यथा – 'पूतनावध, शकटवध, ममलार्जुन-पतन, माखन-चोरी, कालिय-मर्दन, धेनुक वध प्रलम्ब-वध, गोवर्धन-धारण इत्यादि। कृष्ण की इन लीलाओ का वर्णन करते समय पुराणकार ने यथास्थल प्रकृति के भी मनोरम चित्रण प्रस्तुत किये हैं। इसके अतिरिक्त पद्म पुराण, वायुपुराण, वामनपुराण, सूर्य पुराण, गरुड-पुराण और विष्णुपुराण, मे भी कृष्ण से सम्बद्ध अनेक गाथाओ का वर्णन किया गया है। पद्मपुराण मे अध्याय ६६ से ७२ तक श्री कृष्ण के महात्म्य का वर्णन है और अध्याय ७२ से ८३ तक वृन्दावन आदि के महत्त्व का तथा कृष्ण की लीलाओ का विवेचन किया गया है। इसी पुराण मे गोपियो के अध्यात्मपक्ष और उनकी उत्पत्ति के विषय मे भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। द्वारिका, गोकुल, मथुरा, वृन्दावन आदि का भी सुन्दर वर्णन है तथा द्वादश वनो का भी उल्लेख है। इस अध्याय के श्लोक ८८ से १०२ तक कृष्ण के सौन्दर्य का अत्यन्त मनोरम चित्रण किया गया है। कृष्ण भक्त साहित्य पर इस पुराण का काफी प्रभाव है। पुष्टिमार्गीय आचार्यो ने इसमे से अनेक बातो को तो ज्यो का त्यो ही अपना लिया है। वायुपुराण मे स्यमन्तक मणि की कथा का विस्तार पूर्वक वर्णन करके फिर कृष्ण जन्म का वर्णन किया गया है। इसके
६६ रसखान-ग्रन्थावली
पश्चात् कृष्ण की सोलह सहस्र रानियो तथा उनके पुत्रो आदि का वर्णन है । वामनपुराण मे कृष्ण जीवन से सम्बद्ध केवल केशी, मुर और कालनेमि के वध की कथाओ का वर्णन है । कूर्मपुराण मे यदुवश वर्णन के अन्तर्गत कृष्ण के पुत्रो की कथा वर्णित है गरुणपुराण के १४८ वे अध्याय मे कृष्ण की लीलाओ का विस्तार पूर्वक वर्णन है । इस पुराण मे कृष्ण-विषयक कथाएँ ये हैं— पूतना-वध, यमलार्जुनोद्धार, गोवर्धन-धारण, केशी-चाणूर-वध, कालिय मर्दन, शकटासुर-वध, कृष्ण की रुक्मिणी सत्यभामा आदि आठ रानियो का उल्लेख और सदीपन गुरु के पास विद्याध्ययन । विष्णुपुराण मे चौथे अंश के पन्द्रहवे अध्याय मे श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन है। पाँचवे अंश मे कृष्ण-चरित का विशेष रूप से अंकन हुआ है। इसमे कृष्ण की लीलाओ के साथ-साथ रासलीला का भी वर्णन है । कृष्ण-चरित से सम्बद्ध भागवतपुराण सब पुराणो से अधिक महत्वपूर्ण है । कृष्णभक्तो ने अपने मार्ग में इसी को आधार के रूप मे ग्रहण किया है । महा- भारत से लेकर पुराणकाल तक जितना भी कृष्ण का विवेचन हुआ है, वह सब इस पुराण मे संग्रहीत है यद्यपि इस पुराण मे कृष्ण के सभी रूप आ गये हैं, पर प्रमुखता रसिकराज कृष्ण की ही है । डा० हरवमलाल शर्मा ने बाल-लीलाओ को छोडकर कृष्ण के शेष जीवन चरित की दृष्टि से भगवत के प्रतिपाद्य को घटनात्मक, उपदेशात्मक, स्तुत्यात्मक और गीतात्मक इन चार भागो मे विभा- जित किया है और इनका विवेचन निम्नलिखित शब्दो मे किया है — १. घटनात्मक—श्रीमदभागवत के वे स्थल घटना-प्रधान स्थल हैं जो ऐति- हासिक घटनाओ का वर्णन करते हैं । परन्तु जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के चरित्र को चित्रित करते हुए 'रामचरित- मानस मे ग्रन्थ के प्रधान सूत्र भक्ति को नही छोडते और उसी भावना से अभि- भूत होकर अनजाने ही राम के चरित मे अलौकिकता का रूपादेश कर जाते हैं, उसी प्रकार व्यास जी का लक्ष्य भी भगवत भक्त-निरूपण द्वारा भक्तिरस का परिपाक करना है । अतएव भागवतकार ने घटनात्मक स्थलो पर भी भगवान के दिव्य मंगल-स्वरूप की कई बार स्तुति कराई है । जैसे—भोमासुर-वध के समय, वाणासुर-सग्राम के समय तथा वेद-स्तुति आदि । इन घटनाओ मे अलौ- किक घटनाओ का भी सम्मिश्रण है। जैसे स्वर्ग से कल्पवृक्ष लाना, देवकी के मृतक पुत्रो को लाना आदि । ऐसे स्थलो पर कवि की प्रतिभा सजग हो उठती है और वह भगवान के स्वरूप मे इतना तन्मय हो जाता है कि अन्य सब भाव अभिभूत हो जाते हैं तथा हृद्यानुभूति रागात्मिका वृत्ति के साथ उन स्तुतियो और स्तोत्रो के रूप मे साक्षात् रूप धारण कर लेती है । श्रीमद्भागवत मे जहाँ-जहाँ भी इन घटनाओ का उल्लेख है, वही वही कवि की इस अनुभूति का परिचय मिलता है । इस घटनात्मक भाग मे
समीक्षा भाग ६७
भागवतकार का उद्देश्य भी भक्ति की दृढ़ता ही है । २ उपदेशात्मक—भागवत के उपदेशात्मक भाग मे हमे श्रीकृष्ण योगेश्वर, उपदेष्टा तथा विज्ञानी के रूप मे मिलते है। श्रीमद्भागवत मे दो प्रकार के उपदेश है—साधारण तथा विशेष । साधारण उपदेश वे उपदेश है जो साधु, महात्माओ, गुरुजनो या मित्रो ने दिए है। इन उपदेशो का अभिप्राय कर्त्तव्यकर्म का अनुष्ठान करते हुए भगवद्भक्ति करना है। विशेष उपदेशो के रूप मे वे स्थल आते है, जहाँ उपदेश किसी व्यक्ति विशेष को विशेष रूप से दिये गए हैं। जैसे उद्धव के प्रति भगवान् के उपदेश, ध्रुव को नारद का उपदेश, चतु श्लोकी भागवत तथा कपिलगीता आदि । ये उपदेश बड़े महत्वपूर्ण है क्योकि इनसे दो बातो की व्याख्या हुई है—परमतत्व की और ज्ञान-भक्ति कर्म की । ३. स्तुत्यात्मक—भागवत का स्तुत्यात्मक भाग भी बडा महत्त्वपूर्ण है क्योकि इसके द्वारा भी कृष्ण के वास्तविक रूप की व्याख्या की गई है । ये स्तुतियाँ दो प्रकार की है—सकाम और निष्काम । सकाम स्तुतियाँ वे है जो किसी कामना से प्रेरित होकर की गई है। जैसे—कारागार से मुक्त होने के लिए, किसी आपत्ति या दैहिक, दैविक, भौतिक तापो की निवृत्ति के लिए की गई है। निष्काम स्तुतियाँ दो प्रकार की होती है—एक तो वे जिनमे तत्त्व- ज्ञान की प्रधानता है और दूसरी वे जिनमे साधन की प्रधानता है। वेद-स्तुति तत्वज्ञान-प्रधान स्तुति कही जायेगी, क्योकि इसमे सब तत्वो का पर्यवसान एक ही तत्त्व मे दिखाया गया है। प्रह्लाद अम्बरीष, ब्रह्मा, ध्रुव आदि की स्तुतिया साधन-प्रधान कही जायेगी क्योकि इनमे भक्त मुक्ति का इच्छुक न होकर केवल भगवान के रूप तथा लीला के स्मरण, कीर्तन मे आनन्द लेता है। ४ गीतात्मक—श्रीमद्भागवत का चौथा भाग गीतात्मक है। इन गीतों मे ग्रन्थकार का हृदय साक्षात् रूप से द्रवित होता हुआ प्रतीत होता है। उसकी अन्तरात्मा इन गीतो मे पूर्णरूपेण प्रस्फुटित है। ये हृदय के वे स्वत प्रवाही स्रोत हैं जिनका अवरोध कवि के वश की बात नही थी । उसकी आत्मा की व्यथा एव अन्तर्वेदना के ये गीत साकार प्रतिबिम्ब है। प्रेम और विरह की भावनाओ से ओतप्रोत इन गीतो की सख्या अधिक नही है। पाँच गीत गोपियो के तथा एक द्वारिका की कृष्ण-पत्नियो का है । ये छ गीत दशम स्कन्द मे
६८ रसखान-ग्रन्थावली
आए हैं। एकादश स्कन्ध मे भी दो गीत आये है—एक पिंगला का और दूसरा एक भिक्षुक ब्राह्मण का। पिंगला का गीत निर्वेद-गीत है जो ससार के कटु अनुभवो से उत्पन्न अन्तर्वेदना का अभिव्यजन करता है। सात्विक और सदाचारी होने पर भी दुनिया के हाथो अपमानित होने वाले ब्राह्मण भिक्षुक के गीत मे भी वेदना की झलक है। कृष्ण की पत्नियो का गीत दशम स्कन्द के ६०वे अध्याय मे है। उनका मन भगवान की लीला मे इतना तन्मय हो जाता है कि वे अपने को भूल जाती है। सासारिक अनुभवो का ज्ञान लुप्त ह जाता है और आत्म-विभोरता की अनिर्वचनीय दशा मे उनके हृदय-ह्रद से अनायास ही भावधारा वह निकलती है। समस्त प्रकृति उन्हे कृष्णमयी लगतो है और वे प्रकृति के सब पदार्थों को सम्बोधित करके उनका कृष्ण से सम्बन्ध स्थापित करती है। वे यह भी भूल जाती है कि कृष्ण उनके समीप हैं। गोपी गीतो का वर्णन तो वर्णनातीत है। उनके पांचो गीतो मे अनुपम प्रेम की झलक है। प्रतीत होता है हृदय वाणी के साथ लिपटा हुआ चला आया है। उपर्युक्त विवेचन से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं— १ कृष्ण के दो रूप है—सगुण कृष्ण और निर्गुण कृष्ण। २ कृष्ण का सौन्दर्य अमित है। ३ कृष्ण और गोपियो मे घनिष्ठ प्रेम-सम्बन्ध है। ४ कृष्ण अनेक प्रकार की लीलाएँ करते हैं। रसखान ने भी कृष्ण के स्वरूप मे इन्ही विशेषताओ को प्रतिष्ठित किया है। सगुण कृष्ण सिद्धान्तत कृष्णभक्त-कवि कृष्ण का निर्गुण रूप ही स्वीकार करते हैं, पर व्यवहारत उन्हे कृष्ण का सगुण और साकार रूप ही मान्य है। इसका कारण यह हे कि भक्ति के लिए किसी साकार आलम्बन की आवश्यकता होती है, क्योकि निराकार आराध्य पर मन की एकाग्रता प्रतिष्ठित नही हो सकती। सूरदास के शब्दो मे— 'रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालम्ब मन चकृत धावै। सब विधि अगम विचारहि ताते सूर सगुन लीला पद गावै ॥' इस सगुण कृष्ण मे कृष्णभक्तो ने अनेक प्रकार की विशेषताओ का समावेश किया है। ये विशेषताएँ ही कृष्ण की विविध लीलामो के नाम से
पुकारी जाती है। यथा—बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि । रसखान ने अपने काव्य की सीमित परिधि मे इन सभी लीलाओ को समाविष्ट करने का प्रयास किया है । बाललीला मे कृष्ण के बचपन की विभिन्न झाँकियाँ हैं । कृष्ण को खिलाते समय यशोदा किसी गाय की ओट लेकर 'ता' शब्द कहती है जिसे सुनकर कृष्ण अपनी और सब बातो को भूलकर यशोदा को ढूँढने लगते है। वे कुछ पग चलकर जब यशोदा जी को नही देखते तो मचल जाते है और पृथ्वी पर लोटकर अपने वस्त्रो को धूल-धूसरित कर लेते है । तब यशोदा जी उसके पास आती है, कृष्ण हँसने लगते है । यशोदाजी अपना सारा मातृत्व कृष्ण पर बलिहार कर देती है— 'ता' जसुदा कह्यौ धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरै हरि भूलै । ढूँढन कूं पग चारि चलै मचलै रज पाँहि विधूरि दुकूलै । हेरि हँसे रसखान तबै उर भाल तै टारि कै बाद लटूलै । सो छवि देखि अनन्दब नन्दजू अगनि अग समात न फूलै ।' जब कृष्ण बड़े हो जाते है तो उनकी शोभा मे भी अभिवृद्धि हो जाती है । धूल से सना हुआ उनका शरीर, सिर पर बनी हुई चोटी, पैरो मे पहनी हुई पैजनी और धारण किया हुआ पीला वस्त्र अत्यन्त ही शोभायमान लगता है । वह प्रसन्नता से परिपूर्ण होकर माखन और रोटी लिए हुए अपने आँगन मे घूम-घूमकर खा रहे है कि अकस्मात् एक कौवा आता है और उनके हाथ से माखन और रोटी छीनकर ले जाता है— 'धूरि भरे अति सोभित स्यामजू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी । खेलत खात फिरै अँगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी । वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोटी । काग के भाग बडे सजनी हरि-हाथ सौ लै गयौ माखन रोटी ।' कृष्ण जब किशोरावस्था को प्राप्त कर लेते है तो उनका नटखटपना बहुत अधिक बढ जाता है। वे गोपियो को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए विविध लीलाओ की सयोजना करते है । जिनमे से एक रासलीला भी है। रासलीला मे कृष्ण अनेक प्रकार से गोपियो को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करते है। कभी वे अपनी बाँसुरी के स्वरो मे किसी गोपी का नाम ले देते है और कभी अपनी अन्य चेष्टाओ से उन्हे रिझाने की कोशिश
१०८ रसखान-ग्रन्थावली
करते हैं। यथा— १. 'अधर लगाइ रस प्याइ बांसुरी बजाय, मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन में । नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने, करि कै अचेत चेत हरि कै जतन में । झटपट उलटि पुलटि पट परिधान, जानि लागी लानन पै सर्व वाम दन में । रस राम सरम रंगीलो रंगखानि आनि, जानि जोर जुगुति विलास कियौ जन में । २. 'आज पदू गुप्तौ-बट के तट नन्द के नांवरे राम रच्यौ री । नैननि सैननि वैननि सो नहि कोऊ मनोहर भाव बच्यौ री । जद्यपि राखन कौं कुल-कानि सबै ब्रज-बालन प्रान पच्यौ री । तद्यपि वा रसखानि के हाथ विकानी को अत लच्यौ पै मच्यौ री । ३ 'कीजै कहा जु पै लोग चयाव सदा करिबौ करि है वजभारौ । मौन न रोकत राखत कागु सुगावत ताहि री गावनहारौ । आप री सीरी करै अँखियां रसखान घन धन भाग हमारौ ।' आवत है फिरि आज वन्यौ वह राति के रास कौ नाचनहारौ ॥ ४ 'देखत मेज बिछी ही अछी सु बिछी दिप सो भिदिगो सिगरे तन । ऐसी अचेत गिगी नहि चेत उपाय करै सिगरी सजनी जन । बोली सयानी सखी रसखानि बचै धौ सुनाइ बंस्यो जुवती गन । देखन कौ चलियै री चलो सब रस राज्यौ मनमोहन जू बन ।।' रासलीला की भांति फागलीला में भी कृष्ण और गोपियों के प्रेम की मनोहर झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। होली आ गई है। गोपिया कृष्ण से और कृष्ण गोपियो से फाग खेलते हैं । उस समय कृष्ण की जो शोभा होती है उनका वर्णन करना आसान नहीं है— 'खेलतु फागु लख्यो पिय प्यारी को ता सुख की उपमा किहि दीजै । देखत ही बनि आवै भलै रसखान कहा है जो वारि न कीजै । ज्यो ज्यौ छबीली कहै पिचकारी लै एक रहै व्ह दूसरी लीजै । त्यो त्यो छबीलो छकै छकि छाक सो हेरै हँसे न टरै सरो भीजै ।' वस्तुतः जब से फागुन का मास प्रारम्भ होता है, कृष्ण फागलीला मे इतने तल्लीन हो जाते हैं कि ब्रज की शायद ही कोई नवयुवती बचती हो जो
समीक्षा भाग १०१ कृष्ण के साथ फागलीला न करे— 'फागुन लाग्यौ सखी जब ते तब ते ब्रजमण्डत धूम मच्यौ है। नारि नवेली बचै नहिं एक बिसेख मरै सबै प्रेम अँच्यौ है । साँझ सकारे वही रसखानि सुरग गुलाल लै खेल रच्यौ है । को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है।' कृष्ण की कुंज-लीलाएँ भी वैसी ही आकर्षक हैं जैसी अन्य लीलाएँ। जब मुस्कराते हुए कृष्ण कुज से निकलते हैं तो उनकी शोभा को जो भी गोपी देख लेती है वह इतनी भाव-विभोर हो जाती है कि उसे कृष्ण के अतिरिक्त और कोई बात ही याद नहीं रह पाती। उसके सारे सामाजिक बन्धन टूट जाते है और नारी सुलभ लज्जा की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है— 'रग भर्यो मुस्कात लला निकस्यौ कल कु जन ते सुखदाई । मैं तबही निकसी घर ते तकि नैन बिसाल की चोट चलाई । घूमि गिरी रसखानि तबै हरिनी जिमि बान ललजै गिरि जाई। टूटि गयो घर को सब बन्धन टूटिगौ आरज-लाज वडाई।' इन लीलाओ के अतिरिक्त दानलीला, चीरहरण-लीला आदि का वर्णन भी रसखान ने किया है। निर्गुण कृष्ण जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि कृष्णभक्त-कवियो को सिद्धान्ततः कृष्ण का निर्गुण स्वरूप ही मान्य है। इस स्वरूप का प्रतिपादन सभी कवियो ने किया है। सूरदास की विशेषता तो यह रही है कि वे कृष्ण के साकार अथवा अवतारी-रूप का वर्णन करते-करते बीच-बीच मे उनके अलौकिकत्व का भी सकेत देते जाते हैं। यथा— 'जसोदा तेरौ मुख हरि जोव । कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै, बन्धन छोरि जसोव । जो तेरौ सुत खरौ अचगरौ, तऊ कोखि को जायौ । कहा भयौ जो घर कै ढोटा, चोरी माखन खायौ । कोरी मटुकी दह्यौ जमायौ, जाख न पूजन पायौ । तिहि घर देव पितर काहं को, जा घर कान्हर आयौ ।
१०२ रसखान-ग्रन्थावली जाको नाम लेत भ्रम छूटे, कर्म-फन्द सब काटै । - सोई डर्हा जेवरी बाँधे, जननी साँटि लै डाटै । दुखित जानि दोउ सुत कुवेर के ऊखल आपु बँधायौ । सूरदाम प्रभु भक्त हेत ही देह धारि कै आयौ ।' × × × × 'भीतर तै बाहर लौं आवत । घर-आँगन अति चलत सुग भए, देहरि अँटकावत । गिरि-गिरि परत, जात नहिं उलँघी, अति श्रम होत नचावत । अहुँठे पैग वसुधा सब कीनी, धाम अवधि विरमावत ! मन ही मन बलवीर कहत है, ऐसे रंग बनावत । सूरदास-प्रभु-अगनित-महिमा, भगतनि कै मन भावत ! रसखान ने पूर्णरूप से और स्पष्ट रूप से कृष्ण के अलौकिकत्व का वर्णन किया है। ये कहते हैं कि जिस कृष्ण का जप शंकर जैसे देव करते हैं, जिनका ध्यान करके ब्रह्मा अपने धर्म में वृद्धि करते है, जिनका तनिक-सा ध्यान भी हृदय मे लाते ही अत्यन्त मूर्ख भी निपुण ज्ञान के भण्डार बन जाते हैं, जिस पर देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करके सजीवता प्राप्त करती है, उसी कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ थोड़ी-सी छाछ के लिए नाच नचाती हैं— 'सकर से सुर जाहि जपैं, चतुरानन ध्यानन धर्म वढावैं । नैक हिये जिहि आवत ही जड मूढ महा रसखानि कहावैं । जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावैं । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं !' जिस कृष्ण के गुणो का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इन्द्र निरन्तर स्मरण करते हैं, वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त करके उसे अनादि अनन्त, अखण्ड, अच्छेद्य, अभेद्य आदि विशेष विशेषणो से पुकारते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रचण्ड पण्डित भी अपनी पूरी कोशिश करके जिसके स्वरूप का पता न लगा सकने के कारण द्वार पर बैठ गये है, उसी कृष्ण को अहीर की लडकियाँ थोडी-सी छाछ के लिए नाच नचाती है— 'सेष, गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं । जाहि अनादि अनन्त अखण्ड अच्छेद अभेद सु वेद बतावैं ।
समीक्षा भाग १०३ नारद से सुक व्यास रहै पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ।’ जिस कृष्ण के गुणो का गान अप्सरा, गधर्व, शारदा और शेपनाग सभी करते है गणेश जिसके अनन्त नामो का स्मरण करते है, ब्रह्मा और शिव भी जिसके स्वरूप को नही जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिए योगी, यति, तपस्वी और सिद्ध निरन्तर समाधि लगाये रहते है, फिर भी उसका भेद नही जान पाते, उन्ही कृष्ण को अहीर की लडकियाँ थोडी सी छाछ के लिए नाच नचाती है— ‘गावै गुनी गनिका गंधरव औ सारद सेस सबै गुन गावत । नाम अनन्त गनत गनेस ज्यौ ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत । जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत ।’ ब्रह्मा आदि अनेक योगी, जिस कृष्ण के स्वरूप को जानने के लिए समाधि लगाये रहते है पर उसका पार नही पाते, शेषनाग अपनी सहस्रो जिह्वाओ से जिसका निरन्तर जाप करते रहते है, महर्षि नारद अपने हाथ मे वीणा लेकर और उसे बजाते हुए तीनो लोको मे फिरते है पर कोई भी ऐसी साक्षी नही मिलती जिसके आधार पर वे यह दावा कर सके कि उन्होने कृष्ण के स्वरूप को जान लिया है। ऐसे दुर्बोध्य और अनत कृष्ण को अहीर की लडकियाँ थोडी सी छाछ के लिए नाच नचाया करती है । शिव जिनको आराध्य मानकर उनका ध्यान करते है, सारा ससार जिनकी पूजा करता है, जिनसे महान् और कोई दूसरा देव नही है, वही कृष्ण साकार रूप धारण करके अवतरित हुआ है और जो विराट् पुरुष है, वही अपनी लीला दिखाने के लिए माटी खाता फिरता है— ‘सभु धरै ध्यान जाको जपत जहान सब, तातै न महान् और दूसर अव देख्यौ मैं । कहै रसखान वही बालक सरूप धरै, जाको कछु रूप रंग अद्भुत अबलेख्यौ मै । कहा कहूँ आली कछु कहती बनै न दसा, नन्द जी के अगना मे कौतुक एक देख्यौ मै ।
१०४ रसखान-ग्रन्थावली जगत को ठाटी महापुरुप विराटी जो, निरजन निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं ।।' कृष्ण की प्राप्ति के लिए ही सारा जगत प्रयत्नशील है । ये वही कृष्ण हैं जिनकी पूजा ब्रह्मा जी रात-दिन किया करते है, सदा भक्त-वत्सल शिव जिनका पूर्ण तन्मयता से ध्यान करते है, जिनके लिए अहंकारी, मूर्ख, राजा, निर्धन सभी प्रकार के लोग योगी बनकर शीतादि के द्वारा अपने अगो को शिथिल बनाते हैं, वही आनन्द के भण्डार कृष्ण प्राणो के प्राण है जिन्हे देखने के लिए लाखो अभिलाषाएँ लाखो प्रकार से बढती है, जो पृथ्वी पर रहने वाले लोगो का अहकार मिटाने वाले है, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाले है, वे ही यशोदा जी के आगे खुरचनी लेने के लिए मचल कर खडे हुए हैं— 'वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन, सदा सिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है । वेई विप्नु जाके काज मानी मूढ राजा रक, जोगी जती ह्वै के सीत सह्यौ अग डाढे है । वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्रानन के, जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढे है । जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन ये, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ।।' इसके अतिरिक्त कृष्ण का अलौकिकत्व प्रतिपादन करने के लिए रसखान ने कालिय-दमन और कुवलियपीड-वध जैसी कथाओ का भी उल्लेख किया है । इस विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि अन्य कृष्ण-भक्त कवियो की भाँति रसखान ने भी कृष्ण के लौकिक और अलौकिक दोनो प्रकार के रूपो का वर्णन किया है । वस्तुत इनके कृष्ण है तो अलौकिक ही, पर अपने भक्तो को अलौकिक आनन्द प्रदान करने के लिए और लोक की रक्षा करने के लिए वे साकार रूप ग्रहण करके अवतार लेते हे ।
: ८ : रसखान का सौन्दर्य-चित्रण कृष्ण-भक्ति प्रेम-मूलक भक्ति है । प्रेम के लिए आकर्षण एक प्रमुख तत्व है और आकर्षण के लिए सौन्दर्य का होना अनिवार्य है । सौन्दर्य दो प्रकार का होता है—आभ्यन्तरिक सौन्दर्य और बाह्य सौन्दर्य । आभ्यन्तरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत मन की उदात्त भावनाएं आती है । बाह्य सौन्दर्य शारीरिक सौन्दर्य है । कृष्ण-काव्य मे इन दोनो प्रकार के सौन्दर्यो का विस्तार से चित्रण हुआ है । रसखान ने भी अपने सौन्दर्य चित्रण मे इस परम्परा का पालन किया है । आभ्यन्तरिक सौन्दर्य जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, आभ्यन्तरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत मन की उदात्त भावनाएँ आती है । भक्त की इससे अधिक उदात्त भावना और क्या हो सकती है कि वह स्वय को सर्वरूपेण अपने आराध्य के प्रति समर्पित कर दे । रसखान-काव्य मे, अन्य कृष्ण-भक्तो की भाँति समर्पण की यह भावना पूर्णरूपेण लक्षित होती है । इन्होने जिस प्रकार स्वयं को अपने आराध्य के प्रति समर्पित किया है, उसी प्रकार अपनी गोपियो मे भी समर्पण की यह भावना समाविष्ट की है । पहले कवि की समर्पण-भावना को देखिए । रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति मे उसी का सान्निध्य चाहते है, चाहे इसके लिए इन्हे किसी भी प्रकार का फल भुगतना पडे । इसीलिए ये कहते है कि आगामी जन्म मे यदि मुझे मनुष्य योनि मिले तो मै वही मनुष्य बनू जिसे ब्रज और गोकुल के ग्वालो के साथ रहने का अवसर मिले । यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज मे ही हो, ताकि मै नन्द की धेनुओ के मध्य विचरण कर सकूँ । यदि मै पत्थर बनूँ तो उसी पर्वत का बनूँ जिसे इन्द्र का गर्व खंडित करने के लिए कृष्ण १०५
१०६ रसखान-ग्रन्थावली ने अपनी अंगुलियों पर धारण किया था और यदि मै पक्षी बनूँ तो सदैव यमुना के किनारे उगे हुए वृक्षों की शाखों पर चहकता रहूँ— 'मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन । पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौं तौ बसेरो करों मिलि कालिन्दी कूल-कदंब की डारन ॥' इसी प्रकार रसखान अपने शरीरावयवों की सार्थकता तभी मानते है जब उनसे किसी प्रकार आराध्यदेव की सेवा की जाये । ये अपने आराध्यदेव से विनती करते है कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जीभ इन्द्रियों से प्राप्त आनन्द मे न डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटी मे झाड़ लगाने दो, जिससे मेरे हाथ सत्कर्म मे सदैव प्रवृत्त रहे । मुझे. ब्रज की धूल मे अपने शरीर को धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये । यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई विशेष स्थान देना चाहते है तो यमुना तट पर खडे हुए उन्ही कदम्ब वृक्षों की डालियो पर दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे— 'जो रसना रस ना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै कुंज-कुटीरन देहु बुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन । खास निवास मिलै जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदंब की डारन ॥' जिस प्रकार कवि ने कृष्ण के प्रति अपनी उदात्त भावनाओ की अभिव्यक्ति की है, उसी प्रकार गोपियो की उदात्त भावनाओ को भी व्यक्त किया है । ये भावनाएँ कृष्ण के प्रति आकर्षण मे परिलक्षित होती है । गोपियाँ जब भी कृष्ण को देखती है, तभी उनके हृदय का सौन्दर्य उमड पडता है और वे कृष्ण के प्रत्येक अंग मे, उसकी प्रत्येक वस्तु मे सौन्दर्य का अपार पारावार तरंगित देखती है, यदि कभी वे कृष्ण की अलकावलि पर, विशाल भाल पर, हृदय पर, फूलती हुई वनमाल पर भाव-विभोर हो उठती है— 'सखि गोधन गावत हो इक ग्वार लख्यो बहि डार गहे वट की । अलकावलि राजति भाल विसाल लसै बनमाल हिये टटकी ।
समीक्षा भाग १०७ जब ते वह तानि लगी रसखानि निवारै को या मग हौ भटकी । लटकी लट सो दृग-मीननि सो बनसी जियवा नट की अटकी ॥' तो कभी उसे देखते ही उसके सौन्दर्य का ऐसा समन्वित प्रभाव होता है कि उनका शरीर राँग की भाँति ढर जाता है— 'गाइ दुहाइ न या पै कहू, न कहूँ यह मेरी गरी निकरयौ है । धीरसमीर कलिन्दी के तीर खरयौ रहै आजु ही डीठि पर्यो है । जा रसखानि विलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अँग ढर्यो है। गाइन घेरति हेरत सो पट फेरत टेरत आनि अर्यो है ॥' इसी प्रकार के अन्य अनेक उद्धरण प्रस्तुत किये जा सकते है जिनमे गोपियो की उदात्त भावनाएँ —भावो का सौन्दर्य —पूर्णतया व्यक्त हुआ है । बाह्य सौन्दर्य बाह्य सौन्दर्य के अन्तर्गत रसखान ने कृष्ण और राधिका के सौन्दर्य का वर्णन किया है । यह वर्णन दो भागो मे विभाजित किया जा सकता है— १. शारीरिक सौन्दर्य २. चेष्टागत सौन्दर्य रसखान ने कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए जिन अंगो को चुना है, वे बहुत सीमित और परम्परागत है । अत इनके इस वर्णन मे अपेक्षित व्यापकता का अभाव है । प्राय इतर शब्दो मे पुनरावृत्ति-सी ही हुई है । पर यह पुनरावृत्ति भी भावपूर्ण और कवित्वपूर्ण है । कुछ उदाहरण देखिए । यशोदा जी के द्वारा सज्जित कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि ऐ सखि ! मैं आज ही प्रात काल नन्द के उस भवन मे गई थी जहाँ रस-सागर कृष्ण थे । मै उन्हे देखते ही उनमे अनु- रक्त हो गई । उन जैसा पुत्र पाकर यशोदा जी को जो सुख मिला है, उसका वर्णन नही किया जा सकता । मै तो भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि उनका यह पुत्र लाख करोड युगो तक जीवित रहे । यशोदा जी ने उनके सिर पर तेल लगाकर और आँखो मे काजल डाल कर उनके मुख पर डिठौना लगा दिया । उनके गले मे हमेल और हार डालकर यशोदा जी उसके सौन्दर्य को निहारती रही, उन पर स्वय को न्योछावर करके उन्हे चूमती रही— 'आजु गई हुती भोर ही हौ रसखान रई वहि नन्द के भौनहि । वाको जियो जुग लाख करोर, जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि ॥
२०८ रसखान-ग्रन्थावली तेल लगाइ लगाइ कै अंजन, भौंहै बनाइ-बनाइ ढिठौनहिं । डारि हमेलनि हार निहारत, वारत ज्यों चुचकारत छौनहिं ॥ कृष्ण का सौन्दर्य वस्तुत इतना अमित है कि उस पर कामदेव भी अपनी करोड़ों सुन्दरताओ को न्योछावर करने के लिए विवश हो जाता है- "धूरि भरे अति सोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी । खेलत खात फिरै अंगना, पग पैंजनि वाजति पीरी कछौटी ॥ वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कला निज कोटी । काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सो लै गयो माखन-रोटी ।" कृष्ण के गले की मोतियों की माला का, घूंघरदार केशराशि का, जटाऊ आभूषणों का, सिर पर जरीदार पगड़ी का सौन्दर्य भी कुछ कम नहीं है । इस सौन्दर्य का दर्शन तो पूर्व-सञ्चित पुण्यों से ही होता है- 'मोतिन माल बनी नट कै, लटकी लटवा लट घूंघर वारी । अंग ही अंग जराव लगै अरु सीस लगै पगिया जरतारी ॥ पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यो दिसानि की लै छवि, आनिकै झांके झरोखे में बांके विहारी ॥' इनके मस्तक पर लगी हुई गोधूलि को, हृदय पर लहराती हुई वनमाला को, सुरीली वंशी को और पीले वस्त्र की फहराहट को देखकर गोपियाँ इतनी भाव-विभोर हो जाती हैं कि वे सब प्रकार के दुखों को भूलकर आनन्द में डुब- कियां लेने लगती है- गोरज विराजै भाल लहलही वनमाल, आगे गैया पाछे ग्वाल गावैं मृदु तानिरी ॥ तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर-मधुर जैसी, बंक चितवनि मंद मंद मुसकानि री ॥ कदम विटप के निकट तटनी के तट, अटा-चढि चाहि पीत पट फहरानि री ॥ रस बरसावै तन-तपनि बुझावै नैन, प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥' कृष्ण के नेत्रों की वक्रता इतनी तीक्ष्ण है कि कोई गोपी उसकी चोट को सहन नहीं कर सकती, इसीलिए उनकी शोभा से समूचे ब्रज में कोलाहल मचा हुआ है-
समीक्षा भाग १०६ 'नैननि बक विसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली । बेधत है हिम तीछन कोर सुमार गिरी तिम कोटिक हेली ॥ छोडै नही दिनहूँ रसखानि सु लाग फिरै द्रुम सो जनु बेली । रौरि परी छवि की ब्रज-मंडल कु डल गडनि कु तल केली ॥' उनकी दृष्टि और वाणी विलक्षण है, उनकी चंचल दृष्टि भी विलक्षण-सी है। उनके कपोलो पर कुण्डलो की छवि हाथी के गडस्थल पर पडी हुई छवि की भाँति विलक्षण है। जिस समय वे पेड की डाली पकड कर खडे होते है तो उस समय उनकी जो शोभा होती है, उसका वर्णन करना कठिन है। कोई भी गोपी उनकी उस समय की शोभा से और उनकी मधुर मुस्कान से अपने को नही बचा सकती— 'अलबेली विलोकनि बोलनि औ अलबेलियै वोल निहारन की । अलबेली सी डोलति गजनि पै छवि सो मिल कुण्डल बारन की ॥ भटू ठाढौ लख्यौ छवि कैसे कह्यौ रसखानि गहे द्रुम डारन की । हिय मै जिय मै मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥ कृष्ण की विशाल आखे, पुष्ट कपोल, मधुर भाषण, सुन्दर हँसी, सुन्दर मुख को जो भी गोपी एक बार देख लेती है, वह पागल होकर उसे गली गली मे ढूँढती फिरा करती है— 'बाँकी वडी अँखियाँ वडरारे कपोलनि बोलनि कोकिल बानी । सुन्दर हार सुधानिधि सो, मुख मूरति रग सुधारस-सानी ॥ ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी । डोलति है वन वीथिन मे रसखानि मनोहर रूप लुभानी ॥ कृष्ण के नेत्र इतने विशाल है कि वे कानो तक खिचे रहते है। उनके केश मुख पर लहराते रहते है। उनकी सुन्दर शोभा की क्रान्ति चारो ओर बिखर कर करोडो प्रकार के खेल दिखाती है। वास्तविकता तो यह है कि उसकी शोभा झुक कर, झूमकर और अमृत को चूमकर चन्द्रमा की चाँदनी को चुराने वाली है— 'दृग दूने खिंचे रहै कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही । छकि छैल छवीली घटा गहराय कै कौतुक कोटि दिखाइ रही ॥ झुकि भूमि झमाकनि चूमि अमी चहि चाँदनी चंद चुराई रही । मन भाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही ॥'
११० रसखान-ग्रन्थावली सन्ध्या समय जब कृष्ण गायो को चराकर वापिस लौटते हैं तो सारे गोरज से धूसरित हो जाते हैं । उस समय कृष्ण की शोभा ऐसी दिखाई देती है मानो आग के पहाड से बुझकर धुएँ के बादल चढे चले आ रहे हो— साँझ समै जिहि देखति ही तिहि देखन को मन मा ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजवाम सु लाज सनेह दुरै उभकै री ॥ गोधन धूरि की घूँवरि मे तिनकी छवि यो रसखानि नकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानौ धुवाँ-लपटी लपटै लपकै री ॥' कृष्ण का शारीरिक सौन्दर्य स्वाभाविक रूप मे बहुत ही आकर्षक है । पर इस पर स्वाभाविक गति से धारण किये हुए आभूषण उसे और भी अधिक आकर्षक बना देते हैं । कृष्ण के कानो मे पड़े हुए कुण्डल बिजली के समान चमकते है । गौवो के पैरो से उठी हुई धूलि बादलो के उमडने के समान प्रतीत होती है— 'दमकै रवि कुण्डल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजत है । मुक्ताहल-दारन गोपन के मु ती बूँदन की छवि छाजत है ॥ ब्रजवाल नदी उमही रसखानि मयक वधू द्युति लाजत है । यह आवन श्री मनभावन की वरखा जिमि आज विराजत है ।' शारीरिक सौन्दर्य के अतिरिक्त रसखान ने चेष्टागत सौन्दर्य का भी पर्याप्त वर्णन किया है । जिस प्रकार कवि ने शारीरिक सौन्दर्य की परिधि को सीमित रखा है, अर्थात् इने-गिने शरीरावयवो का ही परम्परागत अनुमानो के द्वारा चित्रण किया है; अथवा परम्परागत आभूषणो का उल्लेख किया है, उसी प्रकार चेष्टाएं भी इनी-गिनी है । वक्र-दृष्टि, वंशीवादन, मुस्कराना आदि तक ही कवि ने अपने चेष्टागत सौन्दर्य को सीमित रखा है । निम्नलिखित सवैये मे वंशी-वादन के सौन्दर्य का वर्णन है— आवत है वन ते मनमोहन गाइन सग लसे ब्रज-ग्वाला । वेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगो कछु ख्याला ॥ हेरत हेरि कै चहुँ ओर ते झाँकि झरोखन तै ब्रजवाला । देखि मु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्योस को ताप-कसाला ॥ और— अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाठन खोलत है ॥
समीक्षा भाग १११ सुन री सजनी अलबेलो लला वह कु जनि-कु जनि डोलत है । रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है । इसमे वक्रदृष्टिगत चेष्टा के सौन्दर्य का वर्णन है । कृष्ण के द्वारा गायो के घेरने मे, लाठी को घुमाने मे, वक्रदृष्टि से देखने मे, सगीत की ताने बजाने मे और पीले वस्त्रो के फहराने मे भी गोपियो को अपार सौन्दर्य के दर्शन होते है— 'वह घेरनि धेनु अबेर सबेरनि फेरनि लाल लकुट्टनि की । वह तीछन चच्छु कटाछन की छवि मोरनि भौंह भृकुट्टनि का ।। वह लाल की चाल चुभी चित मे रसखानि सगीत उघुट्टनि की । वह पीत पटकवनि की चटकानि लिटवकनि मोर मुकुट्टनि की ।' कृष्ण की वक्रदृष्टि मे इतना सौन्दर्यपूर्ण आकर्षण है कि उसे देखते ही समस्त ब्रज वालाएँ अपनो कुल लाज और अपने गृह-काज को छोड बैठती हैं— भटू सुन्दर श्याम सिरोमनि मोहन जोहन मै चित चोरत है । अवलोकन वक विलोचन मे ब्रजवालन के दृग जोरत है ।। रसखानि महावत रूप सलोनो को मारग ते मन मोरत है । गृहकाज समाज सबै कुल लाज लला ब्रजराज को तोरत है ।। वक्रदृष्टि का यही प्रभाव निम्नलिखित सवैये मे वर्णित है— आली लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना । गडनि पै छलकै छवि कुण्डल मडित कु तल रूप की सेना ।। दीरघ वक विलोकनि की अवलोकनि चोरित चित्त को चैना । मो रसखानि हर्यौ चित की मुसकाइ कहे अधरामृत वैना ।। कही-कही रसखान ने अनेक चेष्टाओ का एक साथ ही वर्णन किया है । निम्नलिखित सवैये मे वक्रदृष्टि, कटाक्ष मारना, मुस्कराना इन तीनो चेष्टाओ का एक साथ वर्णन किया है— मोहन रुप छकी वन डोलति घूमति री तजि लाज विचारै । वक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै । रग भरी मुख की मुसकान लखै सखि कौन जु देह सम्हारै । ज्यौ अरविन्द हिमत करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।' कृष्ण की चेष्टाओ में मुसकान और वक्र दृष्टि का वर्णन कवि ने सबसे
११२ रसखान-ग्रन्थावली
अधिक किया है । कृष्ण के सौन्दर्य के अतिरिक्त कवि ने राधा के सौन्दर्य का भी वर्णन किया है । राधा के सौन्दर्य के उपमान और उन्हे प्रस्तुत करने की रीति प्राय. परम्परागत है । यथा— 'कैधौ रसखान रस कोस दृग प्यास जानि, आनि के पीयूष पूष कीनो विधि चंद घर । कैधो मनि मानिक बैठारिवो को कचन मै, जरिया जोवन जिन गढ़िया सुघर घर । कैधौ काम कामना के राजत अधर चिन्ह, कैधो यह भौर ज्ञान वोहित गुमान हर । एरी मेरी प्यारी द्युति कोटि रति रम्भा की, वारि डारौ तेरी चित चोरिन चिबुक पर । इस कवित्त मे नेत्र, मुख, शरीर-गठन, अधरो की लाली, नासिका का छिद्र और चिबुक की शोभा का वर्णन किया गया है । इनकी शोभा का वर्णन करने के लिए जिन उपमानो की संयोजना की गई है वे सभी प्राय. परम्परागत हैं । 'श्री मुख सौं न वखान सकै वृषभान सुनाजू को रूप उजारो । हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझनहारो । चारु सिन्दूर को लाल रसाल लसै ब्रजवाल को भाल टिकारो । गोद मैं मानौ विराजत है घनस्याम के सारे की सारे को सारो ॥' इस सवैये मे राधा के समस्त सौन्दर्य के साथ उसके मस्तक पर लगे हुए सिन्दूर के टीके की शोभा का वर्णन किया गया है जो ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा की गोद मे मगल सुशोभित हो । 'अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली ; अलि कुंतल राजत है । मखतूल समान के गुज छरानि मैं किसुक की छवि छाजत है । मुकता के कदम्ब ते अक के मौर सुने सुर कोकिल लाजत हैं । यह प्राननि प्यारी जु की रसखानि वसत-सी आज विराजत है ॥' इस सौन्दर्य-वर्णन मे साग रूपक की योजना के द्वारा राधा को वसन्त बताया गया है । कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती है कि हे सखी ! राधा का अत्यन्त लाल गुलाल के समान दुकूल गुलाव के लाल फूल की भाँति शोभायमान है । उसकी काली केश-राशि भोरो के समान सुशो-