रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ रसखान-ग्रन्थावली
करते हैं। यथा— १. 'अधर लगाइ रस प्याइ बांसुरी बजाय, मेरो नाम गाइ हाइ जादू कियौ मन में । नटखट नवल सुघर नन्दनन्दन ने, करि कै अचेत चेत हरि कै जतन में । झटपट उलटि पुलटि पट परिधान, जानि लागी लानन पै सर्व वाम दन में । रस राम सरम रंगीलो रंगखानि आनि, जानि जोर जुगुति विलास कियौ जन में । २. 'आज पदू गुप्तौ-बट के तट नन्द के नांवरे राम रच्यौ री । नैननि सैननि वैननि सो नहि कोऊ मनोहर भाव बच्यौ री । जद्यपि राखन कौं कुल-कानि सबै ब्रज-बालन प्रान पच्यौ री । तद्यपि वा रसखानि के हाथ विकानी को अत लच्यौ पै मच्यौ री । ३ 'कीजै कहा जु पै लोग चयाव सदा करिबौ करि है वजभारौ । मौन न रोकत राखत कागु सुगावत ताहि री गावनहारौ । आप री सीरी करै अँखियां रसखान घन धन भाग हमारौ ।' आवत है फिरि आज वन्यौ वह राति के रास कौ नाचनहारौ ॥ ४ 'देखत मेज बिछी ही अछी सु बिछी दिप सो भिदिगो सिगरे तन । ऐसी अचेत गिगी नहि चेत उपाय करै सिगरी सजनी जन । बोली सयानी सखी रसखानि बचै धौ सुनाइ बंस्यो जुवती गन । देखन कौ चलियै री चलो सब रस राज्यौ मनमोहन जू बन ।।' रासलीला की भांति फागलीला में भी कृष्ण और गोपियों के प्रेम की मनोहर झांकियां प्रस्तुत की गई हैं। होली आ गई है। गोपिया कृष्ण से और कृष्ण गोपियो से फाग खेलते हैं । उस समय कृष्ण की जो शोभा होती है उनका वर्णन करना आसान नहीं है— 'खेलतु फागु लख्यो पिय प्यारी को ता सुख की उपमा किहि दीजै । देखत ही बनि आवै भलै रसखान कहा है जो वारि न कीजै । ज्यो ज्यौ छबीली कहै पिचकारी लै एक रहै व्ह दूसरी लीजै । त्यो त्यो छबीलो छकै छकि छाक सो हेरै हँसे न टरै सरो भीजै ।' वस्तुतः जब से फागुन का मास प्रारम्भ होता है, कृष्ण फागलीला मे इतने तल्लीन हो जाते हैं कि ब्रज की शायद ही कोई नवयुवती बचती हो जो