रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुकारी जाती है। यथा—बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि । रसखान ने अपने काव्य की सीमित परिधि मे इन सभी लीलाओ को समाविष्ट करने का प्रयास किया है । बाललीला मे कृष्ण के बचपन की विभिन्न झाँकियाँ हैं । कृष्ण को खिलाते समय यशोदा किसी गाय की ओट लेकर 'ता' शब्द कहती है जिसे सुनकर कृष्ण अपनी और सब बातो को भूलकर यशोदा को ढूँढने लगते है। वे कुछ पग चलकर जब यशोदा जी को नही देखते तो मचल जाते है और पृथ्वी पर लोटकर अपने वस्त्रो को धूल-धूसरित कर लेते है । तब यशोदा जी उसके पास आती है, कृष्ण हँसने लगते है । यशोदाजी अपना सारा मातृत्व कृष्ण पर बलिहार कर देती है— 'ता' जसुदा कह्यौ धेनु की ओट ढिंढोरत ताहि फिरै हरि भूलै । ढूँढन कूं पग चारि चलै मचलै रज पाँहि विधूरि दुकूलै । हेरि हँसे रसखान तबै उर भाल तै टारि कै बाद लटूलै । सो छवि देखि अनन्दब नन्दजू अगनि अग समात न फूलै ।' जब कृष्ण बड़े हो जाते है तो उनकी शोभा मे भी अभिवृद्धि हो जाती है । धूल से सना हुआ उनका शरीर, सिर पर बनी हुई चोटी, पैरो मे पहनी हुई पैजनी और धारण किया हुआ पीला वस्त्र अत्यन्त ही शोभायमान लगता है । वह प्रसन्नता से परिपूर्ण होकर माखन और रोटी लिए हुए अपने आँगन मे घूम-घूमकर खा रहे है कि अकस्मात् एक कौवा आता है और उनके हाथ से माखन और रोटी छीनकर ले जाता है— 'धूरि भरे अति सोभित स्यामजू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी । खेलत खात फिरै अँगना पग पैजनी बाजति पीरी कछोटी । वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोटी । काग के भाग बडे सजनी हरि-हाथ सौ लै गयौ माखन रोटी ।' कृष्ण जब किशोरावस्था को प्राप्त कर लेते है तो उनका नटखटपना बहुत अधिक बढ जाता है। वे गोपियो को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए विविध लीलाओ की सयोजना करते है । जिनमे से एक रासलीला भी है। रासलीला मे कृष्ण अनेक प्रकार से गोपियो को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करते है। कभी वे अपनी बाँसुरी के स्वरो मे किसी गोपी का नाम ले देते है और कभी अपनी अन्य चेष्टाओ से उन्हे रिझाने की कोशिश