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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१०४ रसखान-ग्रन्थावली जगत को ठाटी महापुरुप विराटी जो, निरजन निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं ।।' कृष्ण की प्राप्ति के लिए ही सारा जगत प्रयत्नशील है । ये वही कृष्ण हैं जिनकी पूजा ब्रह्मा जी रात-दिन किया करते है, सदा भक्त-वत्सल शिव जिनका पूर्ण तन्मयता से ध्यान करते है, जिनके लिए अहंकारी, मूर्ख, राजा, निर्धन सभी प्रकार के लोग योगी बनकर शीतादि के द्वारा अपने अगो को शिथिल बनाते हैं, वही आनन्द के भण्डार कृष्ण प्राणो के प्राण है जिन्हे देखने के लिए लाखो अभिलाषाएँ लाखो प्रकार से बढती है, जो पृथ्वी पर रहने वाले लोगो का अहकार मिटाने वाले है, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाले है, वे ही यशोदा जी के आगे खुरचनी लेने के लिए मचल कर खडे हुए हैं— 'वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन, सदा सिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है । वेई विप्नु जाके काज मानी मूढ राजा रक, जोगी जती ह्वै के सीत सह्यौ अग डाढे है । वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्रानन के, जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढे है । जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन ये, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ।।' इसके अतिरिक्त कृष्ण का अलौकिकत्व प्रतिपादन करने के लिए रसखान ने कालिय-दमन और कुवलियपीड-वध जैसी कथाओ का भी उल्लेख किया है । इस विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि अन्य कृष्ण-भक्त कवियो की भाँति रसखान ने भी कृष्ण के लौकिक और अलौकिक दोनो प्रकार के रूपो का वर्णन किया है । वस्तुत इनके कृष्ण है तो अलौकिक ही, पर अपने भक्तो को अलौकिक आनन्द प्रदान करने के लिए और लोक की रक्षा करने के लिए वे साकार रूप ग्रहण करके अवतार लेते हे ।