रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १०३ नारद से सुक व्यास रहै पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ।’ जिस कृष्ण के गुणो का गान अप्सरा, गधर्व, शारदा और शेपनाग सभी करते है गणेश जिसके अनन्त नामो का स्मरण करते है, ब्रह्मा और शिव भी जिसके स्वरूप को नही जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिए योगी, यति, तपस्वी और सिद्ध निरन्तर समाधि लगाये रहते है, फिर भी उसका भेद नही जान पाते, उन्ही कृष्ण को अहीर की लडकियाँ थोडी सी छाछ के लिए नाच नचाती है— ‘गावै गुनी गनिका गंधरव औ सारद सेस सबै गुन गावत । नाम अनन्त गनत गनेस ज्यौ ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत । जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत ।’ ब्रह्मा आदि अनेक योगी, जिस कृष्ण के स्वरूप को जानने के लिए समाधि लगाये रहते है पर उसका पार नही पाते, शेषनाग अपनी सहस्रो जिह्वाओ से जिसका निरन्तर जाप करते रहते है, महर्षि नारद अपने हाथ मे वीणा लेकर और उसे बजाते हुए तीनो लोको मे फिरते है पर कोई भी ऐसी साक्षी नही मिलती जिसके आधार पर वे यह दावा कर सके कि उन्होने कृष्ण के स्वरूप को जान लिया है। ऐसे दुर्बोध्य और अनत कृष्ण को अहीर की लडकियाँ थोडी सी छाछ के लिए नाच नचाया करती है । शिव जिनको आराध्य मानकर उनका ध्यान करते है, सारा ससार जिनकी पूजा करता है, जिनसे महान् और कोई दूसरा देव नही है, वही कृष्ण साकार रूप धारण करके अवतरित हुआ है और जो विराट् पुरुष है, वही अपनी लीला दिखाने के लिए माटी खाता फिरता है— ‘सभु धरै ध्यान जाको जपत जहान सब, तातै न महान् और दूसर अव देख्यौ मैं । कहै रसखान वही बालक सरूप धरै, जाको कछु रूप रंग अद्भुत अबलेख्यौ मै । कहा कहूँ आली कछु कहती बनै न दसा, नन्द जी के अगना मे कौतुक एक देख्यौ मै ।