रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ रसखान-ग्रन्थावली जाको नाम लेत भ्रम छूटे, कर्म-फन्द सब काटै । - सोई डर्हा जेवरी बाँधे, जननी साँटि लै डाटै । दुखित जानि दोउ सुत कुवेर के ऊखल आपु बँधायौ । सूरदाम प्रभु भक्त हेत ही देह धारि कै आयौ ।' × × × × 'भीतर तै बाहर लौं आवत । घर-आँगन अति चलत सुग भए, देहरि अँटकावत । गिरि-गिरि परत, जात नहिं उलँघी, अति श्रम होत नचावत । अहुँठे पैग वसुधा सब कीनी, धाम अवधि विरमावत ! मन ही मन बलवीर कहत है, ऐसे रंग बनावत । सूरदास-प्रभु-अगनित-महिमा, भगतनि कै मन भावत ! रसखान ने पूर्णरूप से और स्पष्ट रूप से कृष्ण के अलौकिकत्व का वर्णन किया है। ये कहते हैं कि जिस कृष्ण का जप शंकर जैसे देव करते हैं, जिनका ध्यान करके ब्रह्मा अपने धर्म में वृद्धि करते है, जिनका तनिक-सा ध्यान भी हृदय मे लाते ही अत्यन्त मूर्ख भी निपुण ज्ञान के भण्डार बन जाते हैं, जिस पर देव, किन्नर और पृथ्वी पर रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करके सजीवता प्राप्त करती है, उसी कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ थोड़ी-सी छाछ के लिए नाच नचाती हैं— 'सकर से सुर जाहि जपैं, चतुरानन ध्यानन धर्म वढावैं । नैक हिये जिहि आवत ही जड मूढ महा रसखानि कहावैं । जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावैं । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं !' जिस कृष्ण के गुणो का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इन्द्र निरन्तर स्मरण करते हैं, वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त करके उसे अनादि अनन्त, अखण्ड, अच्छेद्य, अभेद्य आदि विशेष विशेषणो से पुकारते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रचण्ड पण्डित भी अपनी पूरी कोशिश करके जिसके स्वरूप का पता न लगा सकने के कारण द्वार पर बैठ गये है, उसी कृष्ण को अहीर की लडकियाँ थोडी-सी छाछ के लिए नाच नचाती है— 'सेष, गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं । जाहि अनादि अनन्त अखण्ड अच्छेद अभेद सु वेद बतावैं ।