रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: ८ : रसखान का सौन्दर्य-चित्रण कृष्ण-भक्ति प्रेम-मूलक भक्ति है । प्रेम के लिए आकर्षण एक प्रमुख तत्व है और आकर्षण के लिए सौन्दर्य का होना अनिवार्य है । सौन्दर्य दो प्रकार का होता है—आभ्यन्तरिक सौन्दर्य और बाह्य सौन्दर्य । आभ्यन्तरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत मन की उदात्त भावनाएं आती है । बाह्य सौन्दर्य शारीरिक सौन्दर्य है । कृष्ण-काव्य मे इन दोनो प्रकार के सौन्दर्यो का विस्तार से चित्रण हुआ है । रसखान ने भी अपने सौन्दर्य चित्रण मे इस परम्परा का पालन किया है । आभ्यन्तरिक सौन्दर्य जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, आभ्यन्तरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत मन की उदात्त भावनाएँ आती है । भक्त की इससे अधिक उदात्त भावना और क्या हो सकती है कि वह स्वय को सर्वरूपेण अपने आराध्य के प्रति समर्पित कर दे । रसखान-काव्य मे, अन्य कृष्ण-भक्तो की भाँति समर्पण की यह भावना पूर्णरूपेण लक्षित होती है । इन्होने जिस प्रकार स्वयं को अपने आराध्य के प्रति समर्पित किया है, उसी प्रकार अपनी गोपियो मे भी समर्पण की यह भावना समाविष्ट की है । पहले कवि की समर्पण-भावना को देखिए । रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति मे उसी का सान्निध्य चाहते है, चाहे इसके लिए इन्हे किसी भी प्रकार का फल भुगतना पडे । इसीलिए ये कहते है कि आगामी जन्म मे यदि मुझे मनुष्य योनि मिले तो मै वही मनुष्य बनू जिसे ब्रज और गोकुल के ग्वालो के साथ रहने का अवसर मिले । यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज मे ही हो, ताकि मै नन्द की धेनुओ के मध्य विचरण कर सकूँ । यदि मै पत्थर बनूँ तो उसी पर्वत का बनूँ जिसे इन्द्र का गर्व खंडित करने के लिए कृष्ण १०५