रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ रसखान-ग्रन्थावली ने अपनी अंगुलियों पर धारण किया था और यदि मै पक्षी बनूँ तो सदैव यमुना के किनारे उगे हुए वृक्षों की शाखों पर चहकता रहूँ— 'मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन । पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौं तौ बसेरो करों मिलि कालिन्दी कूल-कदंब की डारन ॥' इसी प्रकार रसखान अपने शरीरावयवों की सार्थकता तभी मानते है जब उनसे किसी प्रकार आराध्यदेव की सेवा की जाये । ये अपने आराध्यदेव से विनती करते है कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जीभ इन्द्रियों से प्राप्त आनन्द मे न डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटी मे झाड़ लगाने दो, जिससे मेरे हाथ सत्कर्म मे सदैव प्रवृत्त रहे । मुझे. ब्रज की धूल मे अपने शरीर को धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये । यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई विशेष स्थान देना चाहते है तो यमुना तट पर खडे हुए उन्ही कदम्ब वृक्षों की डालियो पर दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे— 'जो रसना रस ना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै कुंज-कुटीरन देहु बुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन । खास निवास मिलै जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदंब की डारन ॥' जिस प्रकार कवि ने कृष्ण के प्रति अपनी उदात्त भावनाओ की अभिव्यक्ति की है, उसी प्रकार गोपियो की उदात्त भावनाओ को भी व्यक्त किया है । ये भावनाएँ कृष्ण के प्रति आकर्षण मे परिलक्षित होती है । गोपियाँ जब भी कृष्ण को देखती है, तभी उनके हृदय का सौन्दर्य उमड पडता है और वे कृष्ण के प्रत्येक अंग मे, उसकी प्रत्येक वस्तु मे सौन्दर्य का अपार पारावार तरंगित देखती है, यदि कभी वे कृष्ण की अलकावलि पर, विशाल भाल पर, हृदय पर, फूलती हुई वनमाल पर भाव-विभोर हो उठती है— 'सखि गोधन गावत हो इक ग्वार लख्यो बहि डार गहे वट की । अलकावलि राजति भाल विसाल लसै बनमाल हिये टटकी ।