रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १०७ जब ते वह तानि लगी रसखानि निवारै को या मग हौ भटकी । लटकी लट सो दृग-मीननि सो बनसी जियवा नट की अटकी ॥' तो कभी उसे देखते ही उसके सौन्दर्य का ऐसा समन्वित प्रभाव होता है कि उनका शरीर राँग की भाँति ढर जाता है— 'गाइ दुहाइ न या पै कहू, न कहूँ यह मेरी गरी निकरयौ है । धीरसमीर कलिन्दी के तीर खरयौ रहै आजु ही डीठि पर्यो है । जा रसखानि विलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अँग ढर्यो है। गाइन घेरति हेरत सो पट फेरत टेरत आनि अर्यो है ॥' इसी प्रकार के अन्य अनेक उद्धरण प्रस्तुत किये जा सकते है जिनमे गोपियो की उदात्त भावनाएँ —भावो का सौन्दर्य —पूर्णतया व्यक्त हुआ है । बाह्य सौन्दर्य बाह्य सौन्दर्य के अन्तर्गत रसखान ने कृष्ण और राधिका के सौन्दर्य का वर्णन किया है । यह वर्णन दो भागो मे विभाजित किया जा सकता है— १. शारीरिक सौन्दर्य २. चेष्टागत सौन्दर्य रसखान ने कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए जिन अंगो को चुना है, वे बहुत सीमित और परम्परागत है । अत इनके इस वर्णन मे अपेक्षित व्यापकता का अभाव है । प्राय इतर शब्दो मे पुनरावृत्ति-सी ही हुई है । पर यह पुनरावृत्ति भी भावपूर्ण और कवित्वपूर्ण है । कुछ उदाहरण देखिए । यशोदा जी के द्वारा सज्जित कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि ऐ सखि ! मैं आज ही प्रात काल नन्द के उस भवन मे गई थी जहाँ रस-सागर कृष्ण थे । मै उन्हे देखते ही उनमे अनु- रक्त हो गई । उन जैसा पुत्र पाकर यशोदा जी को जो सुख मिला है, उसका वर्णन नही किया जा सकता । मै तो भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि उनका यह पुत्र लाख करोड युगो तक जीवित रहे । यशोदा जी ने उनके सिर पर तेल लगाकर और आँखो मे काजल डाल कर उनके मुख पर डिठौना लगा दिया । उनके गले मे हमेल और हार डालकर यशोदा जी उसके सौन्दर्य को निहारती रही, उन पर स्वय को न्योछावर करके उन्हे चूमती रही— 'आजु गई हुती भोर ही हौ रसखान रई वहि नन्द के भौनहि । वाको जियो जुग लाख करोर, जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि ॥