भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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२०८ रसखान-ग्रन्थावली तेल लगाइ लगाइ कै अंजन, भौंहै बनाइ-बनाइ ढिठौनहिं । डारि हमेलनि हार निहारत, वारत ज्यों चुचकारत छौनहिं ॥ कृष्ण का सौन्दर्य वस्तुत इतना अमित है कि उस पर कामदेव भी अपनी करोड़ों सुन्दरताओ को न्योछावर करने के लिए विवश हो जाता है- "धूरि भरे अति सोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी । खेलत खात फिरै अंगना, पग पैंजनि वाजति पीरी कछौटी ॥ वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कला निज कोटी । काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सो लै गयो माखन-रोटी ।" कृष्ण के गले की मोतियों की माला का, घूंघरदार केशराशि का, जटाऊ आभूषणों का, सिर पर जरीदार पगड़ी का सौन्दर्य भी कुछ कम नहीं है । इस सौन्दर्य का दर्शन तो पूर्व-सञ्चित पुण्यों से ही होता है- 'मोतिन माल बनी नट कै, लटकी लटवा लट घूंघर वारी । अंग ही अंग जराव लगै अरु सीस लगै पगिया जरतारी ॥ पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यो दिसानि की लै छवि, आनिकै झांके झरोखे में बांके विहारी ॥' इनके मस्तक पर लगी हुई गोधूलि को, हृदय पर लहराती हुई वनमाला को, सुरीली वंशी को और पीले वस्त्र की फहराहट को देखकर गोपियाँ इतनी भाव-विभोर हो जाती हैं कि वे सब प्रकार के दुखों को भूलकर आनन्द में डुब- कियां लेने लगती है- गोरज विराजै भाल लहलही वनमाल, आगे गैया पाछे ग्वाल गावैं मृदु तानिरी ॥ तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर-मधुर जैसी, बंक चितवनि मंद मंद मुसकानि री ॥ कदम विटप के निकट तटनी के तट, अटा-चढि चाहि पीत पट फहरानि री ॥ रस बरसावै तन-तपनि बुझावै नैन, प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥' कृष्ण के नेत्रों की वक्रता इतनी तीक्ष्ण है कि कोई गोपी उसकी चोट को सहन नहीं कर सकती, इसीलिए उनकी शोभा से समूचे ब्रज में कोलाहल मचा हुआ है-