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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १०६ 'नैननि बक विसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली । बेधत है हिम तीछन कोर सुमार गिरी तिम कोटिक हेली ॥ छोडै नही दिनहूँ रसखानि सु लाग फिरै द्रुम सो जनु बेली । रौरि परी छवि की ब्रज-मंडल कु डल गडनि कु तल केली ॥' उनकी दृष्टि और वाणी विलक्षण है, उनकी चंचल दृष्टि भी विलक्षण-सी है। उनके कपोलो पर कुण्डलो की छवि हाथी के गडस्थल पर पडी हुई छवि की भाँति विलक्षण है। जिस समय वे पेड की डाली पकड कर खडे होते है तो उस समय उनकी जो शोभा होती है, उसका वर्णन करना कठिन है। कोई भी गोपी उनकी उस समय की शोभा से और उनकी मधुर मुस्कान से अपने को नही बचा सकती— 'अलबेली विलोकनि बोलनि औ अलबेलियै वोल निहारन की । अलबेली सी डोलति गजनि पै छवि सो मिल कुण्डल बारन की ॥ भटू ठाढौ लख्यौ छवि कैसे कह्यौ रसखानि गहे द्रुम डारन की । हिय मै जिय मै मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥ कृष्ण की विशाल आखे, पुष्ट कपोल, मधुर भाषण, सुन्दर हँसी, सुन्दर मुख को जो भी गोपी एक बार देख लेती है, वह पागल होकर उसे गली गली मे ढूँढती फिरा करती है— 'बाँकी वडी अँखियाँ वडरारे कपोलनि बोलनि कोकिल बानी । सुन्दर हार सुधानिधि सो, मुख मूरति रग सुधारस-सानी ॥ ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी । डोलति है वन वीथिन मे रसखानि मनोहर रूप लुभानी ॥ कृष्ण के नेत्र इतने विशाल है कि वे कानो तक खिचे रहते है। उनके केश मुख पर लहराते रहते है। उनकी सुन्दर शोभा की क्रान्ति चारो ओर बिखर कर करोडो प्रकार के खेल दिखाती है। वास्तविकता तो यह है कि उसकी शोभा झुक कर, झूमकर और अमृत को चूमकर चन्द्रमा की चाँदनी को चुराने वाली है— 'दृग दूने खिंचे रहै कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही । छकि छैल छवीली घटा गहराय कै कौतुक कोटि दिखाइ रही ॥ झुकि भूमि झमाकनि चूमि अमी चहि चाँदनी चंद चुराई रही । मन भाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही ॥'