रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० रसखान-ग्रन्थावली सन्ध्या समय जब कृष्ण गायो को चराकर वापिस लौटते हैं तो सारे गोरज से धूसरित हो जाते हैं । उस समय कृष्ण की शोभा ऐसी दिखाई देती है मानो आग के पहाड से बुझकर धुएँ के बादल चढे चले आ रहे हो— साँझ समै जिहि देखति ही तिहि देखन को मन मा ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजवाम सु लाज सनेह दुरै उभकै री ॥ गोधन धूरि की घूँवरि मे तिनकी छवि यो रसखानि नकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानौ धुवाँ-लपटी लपटै लपकै री ॥' कृष्ण का शारीरिक सौन्दर्य स्वाभाविक रूप मे बहुत ही आकर्षक है । पर इस पर स्वाभाविक गति से धारण किये हुए आभूषण उसे और भी अधिक आकर्षक बना देते हैं । कृष्ण के कानो मे पड़े हुए कुण्डल बिजली के समान चमकते है । गौवो के पैरो से उठी हुई धूलि बादलो के उमडने के समान प्रतीत होती है— 'दमकै रवि कुण्डल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजत है । मुक्ताहल-दारन गोपन के मु ती बूँदन की छवि छाजत है ॥ ब्रजवाल नदी उमही रसखानि मयक वधू द्युति लाजत है । यह आवन श्री मनभावन की वरखा जिमि आज विराजत है ।' शारीरिक सौन्दर्य के अतिरिक्त रसखान ने चेष्टागत सौन्दर्य का भी पर्याप्त वर्णन किया है । जिस प्रकार कवि ने शारीरिक सौन्दर्य की परिधि को सीमित रखा है, अर्थात् इने-गिने शरीरावयवो का ही परम्परागत अनुमानो के द्वारा चित्रण किया है; अथवा परम्परागत आभूषणो का उल्लेख किया है, उसी प्रकार चेष्टाएं भी इनी-गिनी है । वक्र-दृष्टि, वंशीवादन, मुस्कराना आदि तक ही कवि ने अपने चेष्टागत सौन्दर्य को सीमित रखा है । निम्नलिखित सवैये मे वंशी-वादन के सौन्दर्य का वर्णन है— आवत है वन ते मनमोहन गाइन सग लसे ब्रज-ग्वाला । वेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगो कछु ख्याला ॥ हेरत हेरि कै चहुँ ओर ते झाँकि झरोखन तै ब्रजवाला । देखि मु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्योस को ताप-कसाला ॥ और— अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाठन खोलत है ॥