रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १११ सुन री सजनी अलबेलो लला वह कु जनि-कु जनि डोलत है । रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है । इसमे वक्रदृष्टिगत चेष्टा के सौन्दर्य का वर्णन है । कृष्ण के द्वारा गायो के घेरने मे, लाठी को घुमाने मे, वक्रदृष्टि से देखने मे, सगीत की ताने बजाने मे और पीले वस्त्रो के फहराने मे भी गोपियो को अपार सौन्दर्य के दर्शन होते है— 'वह घेरनि धेनु अबेर सबेरनि फेरनि लाल लकुट्टनि की । वह तीछन चच्छु कटाछन की छवि मोरनि भौंह भृकुट्टनि का ।। वह लाल की चाल चुभी चित मे रसखानि सगीत उघुट्टनि की । वह पीत पटकवनि की चटकानि लिटवकनि मोर मुकुट्टनि की ।' कृष्ण की वक्रदृष्टि मे इतना सौन्दर्यपूर्ण आकर्षण है कि उसे देखते ही समस्त ब्रज वालाएँ अपनो कुल लाज और अपने गृह-काज को छोड बैठती हैं— भटू सुन्दर श्याम सिरोमनि मोहन जोहन मै चित चोरत है । अवलोकन वक विलोचन मे ब्रजवालन के दृग जोरत है ।। रसखानि महावत रूप सलोनो को मारग ते मन मोरत है । गृहकाज समाज सबै कुल लाज लला ब्रजराज को तोरत है ।। वक्रदृष्टि का यही प्रभाव निम्नलिखित सवैये मे वर्णित है— आली लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना । गडनि पै छलकै छवि कुण्डल मडित कु तल रूप की सेना ।। दीरघ वक विलोकनि की अवलोकनि चोरित चित्त को चैना । मो रसखानि हर्यौ चित की मुसकाइ कहे अधरामृत वैना ।। कही-कही रसखान ने अनेक चेष्टाओ का एक साथ ही वर्णन किया है । निम्नलिखित सवैये मे वक्रदृष्टि, कटाक्ष मारना, मुस्कराना इन तीनो चेष्टाओ का एक साथ वर्णन किया है— मोहन रुप छकी वन डोलति घूमति री तजि लाज विचारै । वक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै । रग भरी मुख की मुसकान लखै सखि कौन जु देह सम्हारै । ज्यौ अरविन्द हिमत करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।' कृष्ण की चेष्टाओ में मुसकान और वक्र दृष्टि का वर्णन कवि ने सबसे