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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

१०४ रसखान-ग्रन्थावली जगत को ठाटी महापुरुप विराटी जो, निरजन निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं ।।' कृष्ण की प्राप्ति के लिए ही सारा जगत प्रयत्नशील है । ये वही कृष्ण हैं जिनकी पूजा ब्रह्मा जी रात-दिन किया करते है, सदा भक्त-वत्सल शिव जिनका पूर्ण तन्मयता से ध्यान करते है, जिनके लिए अहंकारी, मूर्ख, राजा, निर्धन सभी प्रकार के लोग योगी बनकर शीतादि के द्वारा अपने अगो को शिथिल बनाते हैं, वही आनन्द के भण्डार कृष्ण प्राणो के प्राण है जिन्हे देखने के लिए लाखो अभिलाषाएँ लाखो प्रकार से बढती है, जो पृथ्वी पर रहने वाले लोगो का अहकार मिटाने वाले है, कमल के समान सुन्दर नेत्र वाले है, वे ही यशोदा जी के आगे खुरचनी लेने के लिए मचल कर खडे हुए हैं— 'वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन, सदा सिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है । वेई विप्नु जाके काज मानी मूढ राजा रक, जोगी जती ह्वै के सीत सह्यौ अग डाढे है । वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्रानन के, जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढे है । जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन ये, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ।।' इसके अतिरिक्त कृष्ण का अलौकिकत्व प्रतिपादन करने के लिए रसखान ने कालिय-दमन और कुवलियपीड-वध जैसी कथाओ का भी उल्लेख किया है । इस विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि अन्य कृष्ण-भक्त कवियो की भाँति रसखान ने भी कृष्ण के लौकिक और अलौकिक दोनो प्रकार के रूपो का वर्णन किया है । वस्तुत इनके कृष्ण है तो अलौकिक ही, पर अपने भक्तो को अलौकिक आनन्द प्रदान करने के लिए और लोक की रक्षा करने के लिए वे साकार रूप ग्रहण करके अवतार लेते हे ।

: ८ : रसखान का सौन्दर्य-चित्रण कृष्ण-भक्ति प्रेम-मूलक भक्ति है । प्रेम के लिए आकर्षण एक प्रमुख तत्व है और आकर्षण के लिए सौन्दर्य का होना अनिवार्य है । सौन्दर्य दो प्रकार का होता है—आभ्यन्तरिक सौन्दर्य और बाह्य सौन्दर्य । आभ्यन्तरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत मन की उदात्त भावनाएं आती है । बाह्य सौन्दर्य शारीरिक सौन्दर्य है । कृष्ण-काव्य मे इन दोनो प्रकार के सौन्दर्यो का विस्तार से चित्रण हुआ है । रसखान ने भी अपने सौन्दर्य चित्रण मे इस परम्परा का पालन किया है । आभ्यन्तरिक सौन्दर्य जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, आभ्यन्तरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत मन की उदात्त भावनाएँ आती है । भक्त की इससे अधिक उदात्त भावना और क्या हो सकती है कि वह स्वय को सर्वरूपेण अपने आराध्य के प्रति समर्पित कर दे । रसखान-काव्य मे, अन्य कृष्ण-भक्तो की भाँति समर्पण की यह भावना पूर्णरूपेण लक्षित होती है । इन्होने जिस प्रकार स्वयं को अपने आराध्य के प्रति समर्पित किया है, उसी प्रकार अपनी गोपियो मे भी समर्पण की यह भावना समाविष्ट की है । पहले कवि की समर्पण-भावना को देखिए । रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति मे उसी का सान्निध्य चाहते है, चाहे इसके लिए इन्हे किसी भी प्रकार का फल भुगतना पडे । इसीलिए ये कहते है कि आगामी जन्म मे यदि मुझे मनुष्य योनि मिले तो मै वही मनुष्य बनू जिसे ब्रज और गोकुल के ग्वालो के साथ रहने का अवसर मिले । यदि मुझे पशु-योनि मिले तो मेरा जन्म ब्रज मे ही हो, ताकि मै नन्द की धेनुओ के मध्य विचरण कर सकूँ । यदि मै पत्थर बनूँ तो उसी पर्वत का बनूँ जिसे इन्द्र का गर्व खंडित करने के लिए कृष्ण १०५

१०६ रसखान-ग्रन्थावली ने अपनी अंगुलियों पर धारण किया था और यदि मै पक्षी बनूँ तो सदैव यमुना के किनारे उगे हुए वृक्षों की शाखों पर चहकता रहूँ— 'मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन । पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौं तौ बसेरो करों मिलि कालिन्दी कूल-कदंब की डारन ॥' इसी प्रकार रसखान अपने शरीरावयवों की सार्थकता तभी मानते है जब उनसे किसी प्रकार आराध्यदेव की सेवा की जाये । ये अपने आराध्यदेव से विनती करते है कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जीभ इन्द्रियों से प्राप्त आनन्द मे न डूब जाये । मुझे कुंजो मे बनी हुई अपनी कुटी मे झाड़ लगाने दो, जिससे मेरे हाथ सत्कर्म मे सदैव प्रवृत्त रहे । मुझे. ब्रज की धूल मे अपने शरीर को धूसरित करने दो, जिससे मुझे अणिमा आदि आठो सिद्धियो का सुख मिल जाये । यदि आप मुझे निवास करने के लिए कोई विशेष स्थान देना चाहते है तो यमुना तट पर खडे हुए उन्ही कदम्ब वृक्षों की डालियो पर दीजिए जहाँ पर आप अनेक प्रकार की क्रीडाएँ किया करते थे— 'जो रसना रस ना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन । मो कर नीकी करै करनी जु पै कुंज-कुटीरन देहु बुहारन । सिद्धि समृद्धि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन । खास निवास मिलै जु पै तौ वही कालिन्दी-कूल-कदंब की डारन ॥' जिस प्रकार कवि ने कृष्ण के प्रति अपनी उदात्त भावनाओ की अभिव्यक्ति की है, उसी प्रकार गोपियो की उदात्त भावनाओ को भी व्यक्त किया है । ये भावनाएँ कृष्ण के प्रति आकर्षण मे परिलक्षित होती है । गोपियाँ जब भी कृष्ण को देखती है, तभी उनके हृदय का सौन्दर्य उमड पडता है और वे कृष्ण के प्रत्येक अंग मे, उसकी प्रत्येक वस्तु मे सौन्दर्य का अपार पारावार तरंगित देखती है, यदि कभी वे कृष्ण की अलकावलि पर, विशाल भाल पर, हृदय पर, फूलती हुई वनमाल पर भाव-विभोर हो उठती है— 'सखि गोधन गावत हो इक ग्वार लख्यो बहि डार गहे वट की । अलकावलि राजति भाल विसाल लसै बनमाल हिये टटकी ।

समीक्षा भाग १०७ जब ते वह तानि लगी रसखानि निवारै को या मग हौ भटकी । लटकी लट सो दृग-मीननि सो बनसी जियवा नट की अटकी ॥' तो कभी उसे देखते ही उसके सौन्दर्य का ऐसा समन्वित प्रभाव होता है कि उनका शरीर राँग की भाँति ढर जाता है— 'गाइ दुहाइ न या पै कहू, न कहूँ यह मेरी गरी निकरयौ है । धीरसमीर कलिन्दी के तीर खरयौ रहै आजु ही डीठि पर्यो है । जा रसखानि विलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अँग ढर्यो है। गाइन घेरति हेरत सो पट फेरत टेरत आनि अर्यो है ॥' इसी प्रकार के अन्य अनेक उद्धरण प्रस्तुत किये जा सकते है जिनमे गोपियो की उदात्त भावनाएँ —भावो का सौन्दर्य —पूर्णतया व्यक्त हुआ है । बाह्य सौन्दर्य बाह्य सौन्दर्य के अन्तर्गत रसखान ने कृष्ण और राधिका के सौन्दर्य का वर्णन किया है । यह वर्णन दो भागो मे विभाजित किया जा सकता है— १. शारीरिक सौन्दर्य २. चेष्टागत सौन्दर्य रसखान ने कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए जिन अंगो को चुना है, वे बहुत सीमित और परम्परागत है । अत इनके इस वर्णन मे अपेक्षित व्यापकता का अभाव है । प्राय इतर शब्दो मे पुनरावृत्ति-सी ही हुई है । पर यह पुनरावृत्ति भी भावपूर्ण और कवित्वपूर्ण है । कुछ उदाहरण देखिए । यशोदा जी के द्वारा सज्जित कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि ऐ सखि ! मैं आज ही प्रात काल नन्द के उस भवन मे गई थी जहाँ रस-सागर कृष्ण थे । मै उन्हे देखते ही उनमे अनु- रक्त हो गई । उन जैसा पुत्र पाकर यशोदा जी को जो सुख मिला है, उसका वर्णन नही किया जा सकता । मै तो भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि उनका यह पुत्र लाख करोड युगो तक जीवित रहे । यशोदा जी ने उनके सिर पर तेल लगाकर और आँखो मे काजल डाल कर उनके मुख पर डिठौना लगा दिया । उनके गले मे हमेल और हार डालकर यशोदा जी उसके सौन्दर्य को निहारती रही, उन पर स्वय को न्योछावर करके उन्हे चूमती रही— 'आजु गई हुती भोर ही हौ रसखान रई वहि नन्द के भौनहि । वाको जियो जुग लाख करोर, जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि ॥

२०८ रसखान-ग्रन्थावली तेल लगाइ लगाइ कै अंजन, भौंहै बनाइ-बनाइ ढिठौनहिं । डारि हमेलनि हार निहारत, वारत ज्यों चुचकारत छौनहिं ॥ कृष्ण का सौन्दर्य वस्तुत इतना अमित है कि उस पर कामदेव भी अपनी करोड़ों सुन्दरताओ को न्योछावर करने के लिए विवश हो जाता है- "धूरि भरे अति सोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी । खेलत खात फिरै अंगना, पग पैंजनि वाजति पीरी कछौटी ॥ वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कला निज कोटी । काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सो लै गयो माखन-रोटी ।" कृष्ण के गले की मोतियों की माला का, घूंघरदार केशराशि का, जटाऊ आभूषणों का, सिर पर जरीदार पगड़ी का सौन्दर्य भी कुछ कम नहीं है । इस सौन्दर्य का दर्शन तो पूर्व-सञ्चित पुण्यों से ही होता है- 'मोतिन माल बनी नट कै, लटकी लटवा लट घूंघर वारी । अंग ही अंग जराव लगै अरु सीस लगै पगिया जरतारी ॥ पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यो दिसानि की लै छवि, आनिकै झांके झरोखे में बांके विहारी ॥' इनके मस्तक पर लगी हुई गोधूलि को, हृदय पर लहराती हुई वनमाला को, सुरीली वंशी को और पीले वस्त्र की फहराहट को देखकर गोपियाँ इतनी भाव-विभोर हो जाती हैं कि वे सब प्रकार के दुखों को भूलकर आनन्द में डुब- कियां लेने लगती है- गोरज विराजै भाल लहलही वनमाल, आगे गैया पाछे ग्वाल गावैं मृदु तानिरी ॥ तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर-मधुर जैसी, बंक चितवनि मंद मंद मुसकानि री ॥ कदम विटप के निकट तटनी के तट, अटा-चढि चाहि पीत पट फहरानि री ॥ रस बरसावै तन-तपनि बुझावै नैन, प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री ॥' कृष्ण के नेत्रों की वक्रता इतनी तीक्ष्ण है कि कोई गोपी उसकी चोट को सहन नहीं कर सकती, इसीलिए उनकी शोभा से समूचे ब्रज में कोलाहल मचा हुआ है-

समीक्षा भाग १०६ 'नैननि बक विसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली । बेधत है हिम तीछन कोर सुमार गिरी तिम कोटिक हेली ॥ छोडै नही दिनहूँ रसखानि सु लाग फिरै द्रुम सो जनु बेली । रौरि परी छवि की ब्रज-मंडल कु डल गडनि कु तल केली ॥' उनकी दृष्टि और वाणी विलक्षण है, उनकी चंचल दृष्टि भी विलक्षण-सी है। उनके कपोलो पर कुण्डलो की छवि हाथी के गडस्थल पर पडी हुई छवि की भाँति विलक्षण है। जिस समय वे पेड की डाली पकड कर खडे होते है तो उस समय उनकी जो शोभा होती है, उसका वर्णन करना कठिन है। कोई भी गोपी उनकी उस समय की शोभा से और उनकी मधुर मुस्कान से अपने को नही बचा सकती— 'अलबेली विलोकनि बोलनि औ अलबेलियै वोल निहारन की । अलबेली सी डोलति गजनि पै छवि सो मिल कुण्डल बारन की ॥ भटू ठाढौ लख्यौ छवि कैसे कह्यौ रसखानि गहे द्रुम डारन की । हिय मै जिय मै मुसकानि रसी गति को सिखवै निरवारन की ॥ कृष्ण की विशाल आखे, पुष्ट कपोल, मधुर भाषण, सुन्दर हँसी, सुन्दर मुख को जो भी गोपी एक बार देख लेती है, वह पागल होकर उसे गली गली मे ढूँढती फिरा करती है— 'बाँकी वडी अँखियाँ वडरारे कपोलनि बोलनि कोकिल बानी । सुन्दर हार सुधानिधि सो, मुख मूरति रग सुधारस-सानी ॥ ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी । डोलति है वन वीथिन मे रसखानि मनोहर रूप लुभानी ॥ कृष्ण के नेत्र इतने विशाल है कि वे कानो तक खिचे रहते है। उनके केश मुख पर लहराते रहते है। उनकी सुन्दर शोभा की क्रान्ति चारो ओर बिखर कर करोडो प्रकार के खेल दिखाती है। वास्तविकता तो यह है कि उसकी शोभा झुक कर, झूमकर और अमृत को चूमकर चन्द्रमा की चाँदनी को चुराने वाली है— 'दृग दूने खिंचे रहै कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही । छकि छैल छवीली घटा गहराय कै कौतुक कोटि दिखाइ रही ॥ झुकि भूमि झमाकनि चूमि अमी चहि चाँदनी चंद चुराई रही । मन भाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही ॥'

११० रसखान-ग्रन्थावली सन्ध्या समय जब कृष्ण गायो को चराकर वापिस लौटते हैं तो सारे गोरज से धूसरित हो जाते हैं । उस समय कृष्ण की शोभा ऐसी दिखाई देती है मानो आग के पहाड से बुझकर धुएँ के बादल चढे चले आ रहे हो— साँझ समै जिहि देखति ही तिहि देखन को मन मा ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजवाम सु लाज सनेह दुरै उभकै री ॥ गोधन धूरि की घूँवरि मे तिनकी छवि यो रसखानि नकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानौ धुवाँ-लपटी लपटै लपकै री ॥' कृष्ण का शारीरिक सौन्दर्य स्वाभाविक रूप मे बहुत ही आकर्षक है । पर इस पर स्वाभाविक गति से धारण किये हुए आभूषण उसे और भी अधिक आकर्षक बना देते हैं । कृष्ण के कानो मे पड़े हुए कुण्डल बिजली के समान चमकते है । गौवो के पैरो से उठी हुई धूलि बादलो के उमडने के समान प्रतीत होती है— 'दमकै रवि कुण्डल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजत है । मुक्ताहल-दारन गोपन के मु ती बूँदन की छवि छाजत है ॥ ब्रजवाल नदी उमही रसखानि मयक वधू द्युति लाजत है । यह आवन श्री मनभावन की वरखा जिमि आज विराजत है ।' शारीरिक सौन्दर्य के अतिरिक्त रसखान ने चेष्टागत सौन्दर्य का भी पर्याप्त वर्णन किया है । जिस प्रकार कवि ने शारीरिक सौन्दर्य की परिधि को सीमित रखा है, अर्थात् इने-गिने शरीरावयवो का ही परम्परागत अनुमानो के द्वारा चित्रण किया है; अथवा परम्परागत आभूषणो का उल्लेख किया है, उसी प्रकार चेष्टाएं भी इनी-गिनी है । वक्र-दृष्टि, वंशीवादन, मुस्कराना आदि तक ही कवि ने अपने चेष्टागत सौन्दर्य को सीमित रखा है । निम्नलिखित सवैये मे वंशी-वादन के सौन्दर्य का वर्णन है— आवत है वन ते मनमोहन गाइन सग लसे ब्रज-ग्वाला । वेनु बजावत गावत गीत अभीत इतै करिगो कछु ख्याला ॥ हेरत हेरि कै चहुँ ओर ते झाँकि झरोखन तै ब्रजवाला । देखि मु आनन को रसखानि तज्यौ सब द्योस को ताप-कसाला ॥ और— अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाठन खोलत है ॥

समीक्षा भाग १११ सुन री सजनी अलबेलो लला वह कु जनि-कु जनि डोलत है । रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है । इसमे वक्रदृष्टिगत चेष्टा के सौन्दर्य का वर्णन है । कृष्ण के द्वारा गायो के घेरने मे, लाठी को घुमाने मे, वक्रदृष्टि से देखने मे, सगीत की ताने बजाने मे और पीले वस्त्रो के फहराने मे भी गोपियो को अपार सौन्दर्य के दर्शन होते है— 'वह घेरनि धेनु अबेर सबेरनि फेरनि लाल लकुट्टनि की । वह तीछन चच्छु कटाछन की छवि मोरनि भौंह भृकुट्टनि का ।। वह लाल की चाल चुभी चित मे रसखानि सगीत उघुट्टनि की । वह पीत पटकवनि की चटकानि लिटवकनि मोर मुकुट्टनि की ।' कृष्ण की वक्रदृष्टि मे इतना सौन्दर्यपूर्ण आकर्षण है कि उसे देखते ही समस्त ब्रज वालाएँ अपनो कुल लाज और अपने गृह-काज को छोड बैठती हैं— भटू सुन्दर श्याम सिरोमनि मोहन जोहन मै चित चोरत है । अवलोकन वक विलोचन मे ब्रजवालन के दृग जोरत है ।। रसखानि महावत रूप सलोनो को मारग ते मन मोरत है । गृहकाज समाज सबै कुल लाज लला ब्रजराज को तोरत है ।। वक्रदृष्टि का यही प्रभाव निम्नलिखित सवैये मे वर्णित है— आली लला घन सो अति सुन्दर तैसो लसै पियरो उपरैना । गडनि पै छलकै छवि कुण्डल मडित कु तल रूप की सेना ।। दीरघ वक विलोकनि की अवलोकनि चोरित चित्त को चैना । मो रसखानि हर्यौ चित की मुसकाइ कहे अधरामृत वैना ।। कही-कही रसखान ने अनेक चेष्टाओ का एक साथ ही वर्णन किया है । निम्नलिखित सवैये मे वक्रदृष्टि, कटाक्ष मारना, मुस्कराना इन तीनो चेष्टाओ का एक साथ वर्णन किया है— मोहन रुप छकी वन डोलति घूमति री तजि लाज विचारै । वक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै । रग भरी मुख की मुसकान लखै सखि कौन जु देह सम्हारै । ज्यौ अरविन्द हिमत करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।' कृष्ण की चेष्टाओ में मुसकान और वक्र दृष्टि का वर्णन कवि ने सबसे

११२ रसखान-ग्रन्थावली

अधिक किया है । कृष्ण के सौन्दर्य के अतिरिक्त कवि ने राधा के सौन्दर्य का भी वर्णन किया है । राधा के सौन्दर्य के उपमान और उन्हे प्रस्तुत करने की रीति प्राय. परम्परागत है । यथा— 'कैधौ रसखान रस कोस दृग प्यास जानि, आनि के पीयूष पूष कीनो विधि चंद घर । कैधो मनि मानिक बैठारिवो को कचन मै, जरिया जोवन जिन गढ़िया सुघर घर । कैधौ काम कामना के राजत अधर चिन्ह, कैधो यह भौर ज्ञान वोहित गुमान हर । एरी मेरी प्यारी द्युति कोटि रति रम्भा की, वारि डारौ तेरी चित चोरिन चिबुक पर । इस कवित्त मे नेत्र, मुख, शरीर-गठन, अधरो की लाली, नासिका का छिद्र और चिबुक की शोभा का वर्णन किया गया है । इनकी शोभा का वर्णन करने के लिए जिन उपमानो की संयोजना की गई है वे सभी प्राय. परम्परागत हैं । 'श्री मुख सौं न वखान सकै वृषभान सुनाजू को रूप उजारो । हे रसखान तू ज्ञान सभार तरैनि निहार जु रीझनहारो । चारु सिन्दूर को लाल रसाल लसै ब्रजवाल को भाल टिकारो । गोद मैं मानौ विराजत है घनस्याम के सारे की सारे को सारो ॥' इस सवैये मे राधा के समस्त सौन्दर्य के साथ उसके मस्तक पर लगे हुए सिन्दूर के टीके की शोभा का वर्णन किया गया है जो ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा की गोद मे मगल सुशोभित हो । 'अति लाल गुलाल दुकूल ते फूल अली ; अलि कुंतल राजत है । मखतूल समान के गुज छरानि मैं किसुक की छवि छाजत है । मुकता के कदम्ब ते अक के मौर सुने सुर कोकिल लाजत हैं । यह प्राननि प्यारी जु की रसखानि वसत-सी आज विराजत है ॥' इस सौन्दर्य-वर्णन मे साग रूपक की योजना के द्वारा राधा को वसन्त बताया गया है । कोई गोपी अपनी सखी से राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती है कि हे सखी ! राधा का अत्यन्त लाल गुलाल के समान दुकूल गुलाव के लाल फूल की भाँति शोभायमान है । उसकी काली केश-राशि भोरो के समान सुशो-

भित है । काले रेशम की डोरियो मे बँधे हुए गुंज पलाश-पुष्प की भाँति शोभा से सम्पन्न है । उसके मोती कदम्ब और आम की मजरियो के समान शोभाय- मान है । उसकी वाणी मे इतना माधुर्य हे कि उसके वचनो को सुनकर कोयल भी लज्जित हो जाती है । 'तन चदन खोर कै बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी । मनौ इंदुवधून लजावन कौ सब ज्ञानिन काढि धरी गन-सी । रसखानि विराजति चौकी कुचौ विच उत्तमताहि जरी तन-सी । दमकै दृग-बान के घायन कौ गिरि सेत के संधि के जीवन-सी ॥' अपने शरीर पर चन्दन लगाकर बैठी हुई वह सुधा की मानस-पुत्री राधा ऐसी प्रतीत हो रही है मानो चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को लज्जित करने के लिए सब प्रकार से अपनी समग्र सात्विक शोभा को बाहर निकालकर बैठी हुई हो । उसके कुचो के बीच मे हार का चदा इस प्रकार सुशोभित है जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो । वह चन्दा ऐसा प्रतीत होता है मानो दृग वाणो का घाव दमक रहा हो, अथवा श्वेत पर्वत के संधि- स्थान मे कोई जलाशय हो । 'आज सँवारति नेकु भटू तन, मद करी रति की दुति लाजै । देखत रीझि रहे रसखानि सु, और कहा विधिना उपराजै । आए है न्यौते तरैयन के मनो सग पतग पतग जुराजै । ऐसे लसै मुकुतागन मै तिल तेरे तरौना के तीर विराजै ॥' कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज तनिक अपना शरीर सभाल लो, क्योकि इसके समक्ष रति का सौन्दर्य भी मद हो गया है और वह इसी कारण लज्जित हो रही है । आनन्द- सागर कृष्ण तुम्हारी शोभा को देखकर रीझ रहे है । तुम ब्रह्मा की सौन्दर्य- सृष्टि की चरम पराकाष्ठा हो । मोतियो से युक्त तुम्हारे तरौना के किनारे पर सुशोभित तिल इस प्रकार शोभा दे रहा है मानो सूर्य के साथ सारे नक्षत्र आकर एकत्र हो गये हो । यह राधिका का स्वाभाविक सौन्दर्य है, किन्तु कवि ने उस सौन्दर्य का भी वर्णन किया है जो आभूषणो एव परिधानो के कारण द्विगुणित हो रहा है । यथा — 'प्यारी की चारु सिगार तरगन जाय लगी रति की दुति कूलनि । जोवन जेव कहा कहिए उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि ।

११४ रसखान-ग्रन्थावली कंचुकी सेत मैं जावक-विन्दु विलोकि मरै मघवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनो रसखान सु भूत के भूप वधूक के फूलनि ॥' अर्थात् राधा के सुन्दर सौन्दर्य की लहरें रति की शोभा के किनारों से जा लगी ह । उसके यौवन की कांति का तो कहना ही क्या ? उसके हृदय पर अनेक वस्त्रो की शोभा सुशोभित है । उसकी श्वेत कंचुकी में लाल रंग के विन्दु को देखकर तो मनुष्य इन्द्र के वज्र की चोट की भांति भारी चोट खाकर मर जाता है । उसके कुचों पर पडा हुआ लाल वस्त्र इस प्रकार प्रतीत हो रहा है मानो वधूक के फूलों से शिव की पूजा की गई हो । राधा की शरीर-कांति इस प्रकार चमकती है जैसे दिये की बाती उकसा दी गई हो— 'वाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियाँ तिरछानि तिया की । टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिन तें द्युति दूनी तिया की । लीहैं तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोवन-जोति सु यौं दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥' राधा के शरीरावयवों के सौन्दर्य-वर्णन मे परम्परागत उपमानो का ही प्रयोग किया गया है । यथा— 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौंह गुमान हरै । दीरघ नैन सरोजहुँ तें मृग खंजन मीन की पाँत दरै । रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै । जिंहि नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहे सब काम करै । इस सवैये मे मुख के लिए चन्द्रमा का, भौंह के लिए कमानी का, नेत्रों के लिए कमल, खंजन, मृग और मीन का उपमान ग्रहण किया गया है । ये उपमान उपर्युक्त उपमेयो के लिए परम्परागत हैं । इस विवेचन के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि यद्यपि रसखान ने सौन्दर्य के दोनो पक्षो का—आन्तरिक पक्ष और वाह्य पक्ष का—वर्णन किया है, पर इनके वर्णन में व्यापकता नही है । गिने-चुने शरीरावयवो की तथा भावों की परम्परागत उपमानो के द्वारा शोभा वर्णित की गई है अत. पुनरावृत्ति भी पाई जाती है । यह पुनरावृत्ति मुक्तक काव्य में किसी प्रकार की बाधा भी नही है । निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि अपनी सौन्दर्य-भावना को व्यक्त करने के लिए कवि ने जिस सीमित क्षेत्र को चुना है, उसमे वे काफी सफल रहे हैं।

: ६ . रसखान की अलंकार-योजना 'अलकार' शब्द दो शब्दो के योग से बना है—अलकार, जिसका अर्थ है अलकृत अथवा विभूषित करने वाला । जिस प्रकार शरीर की शोभा के लिए हारादिक का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार वाणी की शोभा के लिए—सशक्त अभिव्यजना के लिए—उपमा आदि अलकारो का प्रयोग किया जाता है । यहाँ पर यह बता देना भी आवश्यक है कि यदि आभूषणो का उचित प्रयोग न होगा तो वे शरीर की शोभा मे बाधक ही होगे । इसी प्रकार वाणी के अलकार भी तभी अभिव्यजना मे सहायक होते है, जब उनका प्रयोग स्वाभाविक रीति से होता है । प्रयत्न साध्य अलकार-प्रयोग काव्य के काव्यत्व को हानि ही पहुँचाते है । अलकारो के मुख्यतया दो भेद माने गये है—शब्दालकार और अर्था- -लकार । जब चमत्कार शब्द पर आश्रित होता है तो वहाँ शब्दालकार माना जाता है और जब वह अर्थ पर आश्रित होता है तो वह अर्थालंकार माना जाता है । कुछ आचार्यो की मान्यता यह है कि शब्दालकार केवल चमत्कारक होते है, भाव-वर्द्धक नही, पर यह मान्यता उचित नही है । स्वाभाविक रीति से प्रयुक्त शब्दालकार भी भावो को सबल बनाते हैं, उनकी प्रेषणीयता में सहायक सिद्ध होते है । रसखान के काव्य मे दोनो ही प्रकार के अलकारो का प्रचुर प्रयोग मिलता है । यहाँ पर यह भी स्मरण रखना चाहिए कि रसखान का साध्य भावो की अभिव्यक्ति थी, चमत्कारों का प्रदर्शन नही । अत इनके काव्य मे प्रयुक्त अलकार भाववर्द्धक है । शब्दालकार रसखान के काव्य मे शब्दालंकारो का प्रयोग प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। अनुप्रास, यमक, सिहावलोकन, वीप्सा, श्लेष, वक्रोक्ति आदि अलंकारें ११५

११६ रसखान-ग्रन्थावली को इन्होंने बहुत ही सफलता से प्रयोग किया है। यह बात निम्नलिखित विवे- चन से स्वतः सिद्ध हो जाती है । १. अनुप्रास—जहाँ समान व्यंजनों की स्वर-सहित अथवा स्वर-रहित आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है । इसके पाँच भेद माने गये हैं— छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, श्रुत्यनुप्रास, लाटानुप्रास और अन्त्यानुप्रास । जहाँ अनेक वर्णों की एक बार रूपता हो, वहाँ छेकानुप्रास होता है । जहाँ वृत्तिगत अनेक वर्णों का एक वर्ण की अनेक बार समता हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है । जहाँ कण्ठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होने वाले वर्णों की आवृत्ति हो, वहाँ श्रुत्यनुप्रास होता है । जहाँ आवृत्त वाक्यों में तात्पर्य भेद से अर्थ की भिन्नता हो, वहाँ लाटानुप्रास होता है । छन्द की अन्तिम तुक को अन्त्यानुप्रास कहते हैं । रसखान-काव्य में ये सभी भेद उपलब्ध हैं । यथा— 'मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन । पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन । जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल कदंब की डारन । इस सवैये में 'बसौं ब्रज' में 'ब' की, 'गोकुल गाँव' में 'ग' की, 'नित नंद' में 'न' की और, कालिंदी कूल में 'क' वर्णों की आवृत्ति है। अत यहाँ छेकानु- प्रास है । इसी प्रकार— 'संकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं । नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावैं । जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावैं । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरी छाछ पै नाच नचावैं ॥ इसमें 'संकर से सुर' में 'स' की, 'ध्यानन धर्म' में 'ध' की, 'देव अदेव' में 'द' और 'व' की, 'प्रानन पावैं' में 'प' की 'छोहरिया छछिया' में 'छ' की 'नाच नचावै' में 'न' की आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है । वृत्यनुप्रास में वृत्तिगत अनेक वर्णों की या एक वर्ण की अनेक बार समता होती है । यथा— 'सेष गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं । जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावैं ।

समीक्षा भाग ११७ नारद से सुनि व्यास रहे पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥' इस सवैये मे 'स', 'अ' 'द', 'प', और 'घ' वर्ग की अनेक बार आवृत्ति है । अतः यहाँ कोमलावृत्ति से युक्त वृत्यनुप्रास है । इसी प्रकार- 'गावै गुनि गनिका गंधरब औ सारद सेष सबै गुन गावत ।' मे 'ग' और 'स' वर्ण की अनेक बार आवृत्ति होने के कारण वृत्यनुप्रास है । वृत्यनुप्रास के अन्य उदाहरण ये है- १ 'साज समाज सबै सिरताज औ छाज की बात नही कहि आवै ।' - - २ 'सेष सुरेस दिनेस गनेस अजेस धनेस महेस मनावौ । ३. 'है कुछ कचन के कलसा न ये आम की गाँठ मढीक की चाम मे ।' ४. 'लाडली लाल लसै लखियै अलि पुंजनि कुंजनि मै छवि गाढी ।' ५ 'बालन लाल लिये बिहरै छहरै वर मोरपखी सिर ठाढी ।' 'मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी । अग ही अग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी । पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यौ दिसनि को लै छबि आनि कै झाँके झरोखे मै बाँके बिहारी ॥' इस सवैये मे 'त, न, ल' वर्ग दन्त्य स्थान के, 'ट और र, मूर्धन्य स्थान के 'प ब, म' औष्ठ्य स्थान के है। अतः यहाँ श्रुत्यनुप्रास है । ५. यमक- जहाँ एक ही शब्द की दो बार आवृत्ति हो, किन्तु आवृत्त शब्द भिन्नार्थक हो, वहाँ यमक अलकार होता है । यह आवृत्ति तीन प्रकार से हो सकती है- १. जहाँ दोनो शब्द सार्थक हो । २. जहाँ दोनो शब्द निरर्थक हो । ३. जहाँ एक शब्द सार्थक औन एक निरर्थक हो । रसखान के काव्य मे तीनो प्रकार के यमक पाये जाते है । 'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी । हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी । जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी । त्यौ रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ॥' इस सवैये की अंतिम पक्ति मे 'रसखानि शब्द की आवृत्ति है । दोनो

शब्द सार्थक है। अतः यहाँ यमक अलंकार है। 'आजु गई हुती भोर ही हौ रसखानि रई वाहि नंद के भौनहि। वाकौ जियौ जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि। तेल लगाइ लगाइ के अंजन भौंहै बनाइ बनाइ डिठौनहि। आलि हमेलनि हारि निहारत वारत ज्यौ पुचकारत छौनहि ॥' इस सवैये की अंतिम पंक्ति मे प्रयुक्त 'वारत' और 'पुचकारत' इन शब्दों मे 'आरत' शब्द की आवृत्ति है। दोनो ही शब्द निरर्थक हैं। अतः यमक अलंकार है। 'लाल लसै पगिया सबके सबके पट कोटि सुगन्धनि भीनै। अंगनि अंग सजै सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने। मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुमार सिंगार सो कीने। मै सिगरे ब्रज केहरि की हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥' यहाँ अंतिम पंक्ति मे 'केहरि' मे 'हरि' और 'हरि' शब्द की आवृत्ति है। 'केहरि' का 'हरि' निरर्थक है। अतः यहाँ पर एक निरर्थक और एक सार्थक पद की आवृत्ति है। यहाँ यमक अलंकार है। यमक के अन्य कुछ उदाहरण ये है— १. 'जो रसना रस ना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन !' २ 'जो पै राखनहार है माखन चाखनहार।' ३. 'बिमल सकल रसखानि मिलि, भई सकल रसखानि। सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥' ४ 'तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है।' ५. 'ताते तिन्है तजि जनि गिर्यौ गुन सौगुन औगुन गाँठि परैगी।' ६ 'सो कवि देखि आनन्दन नन्द जू अंगनि अंग समात न फूलै।' ७ राधिका जी है तो जीहै सबैन तौ पीहै हलाहल नन्द के द्वारै।' ८. 'यो पछितावो यहै जु सखी कि कलंक लग्यौ पर अंक न लागी।' ३. सिहावलोकन—जिस प्रकार सिंह पीछे मुडकर देखता है, उसी प्रकार अलंकार मे एक चरण के वर्णों की दूसरे चरण के प्रारम्भ मे आवृत्ति होती है। इसे संस्कृत आचार्यो ने मुक्तपदग्राह्य यमक कहा है। रसखान-काव्य मे इस अलंकार का केवल एक उदाहरण मिलता है जो यह है—

समीक्षा भाग ११६ 'भेती जु पै कुबरी ह्याँ सखी भरि लातन मूका वकोटती लेती । लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कीडी पिराइ कै देती। देती नचाइ कै नाच वा रॉड को लाल रिझावन को फल सेती । सेती सदा रसखानि लिये कुबरी के करेजनि सूल सी भेती ॥' इस सवैये मे 'भेती', 'लेती', 'देती' और 'सेती' वर्णों की आवृत्ति है । ४. वीप्सा—जहाँ किसी भाव को सबल बनाने के लिए उन्ही शब्दो की आवृत्ति की जाती है, वहाँ वीप्सा अलंकार होता है । रसखान ने इस अलंकार का भी बडी कुशलता से भावपूर्ण प्रयोग किया है । यथा— 'तै न लख्यौ जब कुंजनि ते बनिके निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री । को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रज-लोग फिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरिवा नट को हियरे भटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ॥' इस सवैये मे 'अटक्यौ' शब्द की तीन बार आवृत्ति के कारण कृष्ण के प्रति गोपी के प्रेम की अधिक प्रगाढता व्यंजित हुई है । इसी प्रकार— 'काननि दै अँगुरी रहिवो जबही मुरली धुनि मद बजै है । मोहनी ताननि सो रसखानि अटा चढि गोधन गैहै तो गैहै । टेरि कहौ सिगरे ब्रज-लोगनि काल्हि कोऊ सु कितौ समुझैहै । माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै न जैहै न जैहै । इस सवैये की चतुर्थ पंक्ति मे 'न जैहै' शब्द की तीन बार आवृत्ति है जो कृष्ण की मुस्कान के आकर्षण को कई गुना बढा देती है । ५ श्लेष—जहाँ कोई शब्द एक से अधिक अर्थों का द्योतन करने के कारण चमत्कारक होता है, वहाँ श्लेष अलंकार होता है । इसके दो भेद किये गये है—सभंग श्लेषऔर अभंग श्लेष । सभंग श्लेष मे पद को भंग करने से एका- धिक अर्थ की प्राप्ति होती है और अभंग श्लेष मे पद को भंग नही करना पडता । सभंग श्लेप की अपेक्षा अभंग श्लेप मे अर्थ की रमणीयता अधिक रहती है । इसीलिए भाव-प्रवण कवियो की रचनाओ मे सभंग श्लेप की अपेक्षा अभंग श्लेप के उदाहरण ही मिला करते है । रसखान मे तो केवल अभंग श्लेप ही मिलता है । यथा— 'ए सजनी लोनो लला, लह्यौ नंद के गेह । चितयौ मृदु मुसकाइ कै, हरी सबै सुधि देह ॥'

१२० रसखान-ग्रन्थावली यहाँ पर 'हरी' शब्द के हरण 'करना' और 'प्रसन्न होना' ये दो अर्थ हैं । इसी प्रकार— 'स्याम सघन घन घेरि कै, रस वरस्यौ रसखानि । भई दिमानी पानि करि, प्रेम मद्य मन मानि ॥' इस दोहे मे 'स्याम' और 'रस' शब्द श्लिष्ट है । इसी प्रकार के अन्य उदाहरण भी रसखान-काव्य से प्रस्तुत किये जा सकते है । ६ वक्रोक्ति—जब वक्ता कोई बात कहे और श्रोता उस बात का अन्य अर्थ, जो वक्ता का अभीष्ट नही है, काकु या श्लेप के वल से ग्रहण करता है, तो वक्रोक्ति अलकार होता है । वक्रोक्ति अलकार के दो भेद है — श्लेप वक्रो- क्ति और काकु वक्रोक्ति । श्लेप वक्रोक्ति की अपेक्षा काकु वक्रोक्ति मे अर्थ की अधिक रमणीयता होती है । इसी कारण अनेक आचार्यो ने काकु कक्रोक्ति को अर्थालकारो के अन्तर्गत माना है । रखसान-काव्य मे काकु-वक्रोक्ति के ही उदाहरण मिलते है । यथा— 'कौन ठगौरी भरि हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रग-भीनी । तान सुनी जिनही तिनही तबही तित लाज विदा करि दीनी । धूमै घरि घरि नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी । या ब्रज-मडल मै रसखानि सु कौन भटू जू लटू नही कीनी ॥' इस सवैये की अतिम पक्ति मे गोपी ने अपनी सखी को काकु के द्वारा बताया है कि इस ब्रज-मडल की प्रत्येक गोपी को कृष्ण ने मोहित कर रक्खा है । इसी प्रकार— 'फागुन लाग्यौ सखी जब तै तब तै ब्रज मडल धूम मच्यौ है । नारि नवेली बचै नहि एक विसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है । साँझ सकारे वही रसखानि सुरग गुलाल लै खेल रच्यौ है । को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है ॥' इसमे 'को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है' मे काकुवक्रोक्ति अलकार है । 'वा रसखानि सुनौ सुत्तिकै हियरा सत टूक है फाटि गयो है । जानति है न कछू हम ह्वाँ उनवाँ पढि मत्र कहा धौ दयौ है ।

समीक्षा भाग १२१ साँची कहैं जिय मै निज जानि कै जानति है जस जैसो लयौ है । लोग लुगाई सबै ब्रज माँहि कहै हरि चेरी को चेरो भयो है ॥' यहाँ पर 'जस जैसो लयौ है' मे काकु के द्वारा यह बताया गया है कि वे बहुत बदनाम हो गए है । अत काकु वक्रोक्ति अलकार है । अर्थालंकार रसखान जैसे भावुक कवि की भाषा मे अर्थालंकारो का प्रवाह आ जाना स्वाभाविक है । इनके द्वारा प्रयुक्त कुछ अर्थालंकारो के उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे है । १. उपमा — उपमान और उपमेय के सादृश्य वर्णन मे उपमा अलंकार होता है । रसखान ने इस अलकार का बहुत मात्रा मे और बहुत कुशलता से प्रयोग किया है । यथा— 'सुनियै सबकी कहिये न कछू रहियै इमि या भव-बागर मै । करियै व्रत-नेम सचाई लिये जिनते तरियै भव-सागर मै । मिलियै सबसो दुरभाव बिना रहियै सतसंग उजागर मै । रसखानि गुबिन्दहि कौ भजियै जिमि नागरि कौ चित्त गागर मै ॥' भगवद्-भजन के लिए नागरी के चित्त की एकाग्रता का सादृश्य दिखलाया गया है । अत यहाँ उपमा अलंकार है । इसी प्रकार— 'लाडली लाल लसै लखियै अलि पुंजनि कुंजनि मै छबि गाढी । ऊजरी ज्यौ बिजुरी सी जुरी चहूँ गुजरी केलि-कला सम काढी । त्यौ रसखानि न जानि परै सुखमा तिहुँ लोकन की अति बाढी । बालन लाल लिये बिहरै छहरै बर मोरपखी सिर ठाढी ।' 'ऊजरी ज्यौ बिजुरी सी जुरी चहूँ गुजरी केलि-कला सम काढी' मे उपमा अलंकार है । इस अलंकार के अन्य उदाहरण ये है— १ सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ।' २. 'ऐचे आवत धनुष से छूटे सर से जाहि ।' ३ 'जा रसखानि बिलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अंग ढर्यो है ।' ४ 'तिरछी वरछी सम मारत है दृग-वान कमान सुकान लग्यो ।' ५ 'जाको लसै मुख चन्द समान सुकोमल अंगनि रूप लपेटी ।' ६ 'चन्द सो आनन मैन मनोहर बैन मनोहर मोहत हौ मन ।'

१२२ रसखान-ग्रन्थावली २. रूपक—उपमेय मे उपमान के निषेध-रहित आरोप को रूपक अलकार कहते है । इसके मुख्यतया दो भेद है— साग रूपक और निरग रूपक । जहाँ उपमेय के अवयवो के सहित उपमान के अवयवो का आरोप किया जाता है, वहाँ साग अथवा सावयव रूपक होता है और जहाँ अवयवो से रहित उपमान का उपमेय मे आरोप किया जाता है, वहाँ निरग अथवा निरवयव रूपक अल- कार होता है। रसखान ने इस अलकार का भी प्रचुर मात्रा मे प्रयोग किया है। यथा— 'अति सुन्दर री ब्रजराज कुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइकै लाज की गाँठन खोलत है। सुनि री सजनी अलबेलौ लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है। रसखानि लखे मन वूडि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है ।।' यहाँ सौन्दर्य पर सागर का आरोप किया गया है, पर अवयवो का उल्लेख नही है । अत. यहाँ निरग रूपक है। और— 'नैन दलालनि चौहटैं, मन-मानिक पिय हाथ । रसखान ढोल बजाइकँ, बेच्यौ हिय जिय साथ ।।' यहाँ भी नैनो पर दलालो का, मन पर माणिक का आरोप किया गया है । अत यहाँ पर निरग रूपक अलकार है । 'दमकै रवि कु डल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजत है। मुकताहल-वारन गोपन के सु तो बून्दन की छवि छाजत है। ब्रजवाल नदी उमही रसखानि मयक-वधू दुति लाजत है। यह आवन श्री मनभावन की बरषा जिमि आज विराजत है ।।' इस सवैये मे कृष्ण के आगमन पर वर्षा-ऋतु का आरोप किया गया है । सभी अगो का वर्णन है । अत यहाँ साग रूपक अलकार है। इस अलकार के अन्य उदाहरण ये है— १ 'मत्त भयौ मन सग फिरै रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ।' २. 'लटकी लट यो दृग-मीननि सो वनसी जियवा नट की अटकी ।' ३. 'मो मन-मानिक लै गयौ चित्तै चोर नदनद ।' ४. 'रसखानि महावत रूप सलोने को मारग ते मन मोहत है ।' ५. 'तिरछी वरछी सम मारत है दृग-वान कमान सुकान लग्यौ ।' ६. 'भौह कमान सो जोहन को सर वेधत आनन नन्द को छोनो ।'

समीक्षा भाग १२३ ३. उत्प्रेक्षा—जहाँ प्रस्तुत की—उपमेय की—अप्रस्तुत रूप मे—उपमान रूप मे—संभावना की जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । इस अलंकार के प्रयोग मे भावो मे प्रभावशीलता आती है । अत रसखान ने उपमा और रूपक की भाँति इस अलंकार का प्रयोग भी बहुलता से किया है । यथा— 'साँझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन यौं ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजबाम सु लाज सनेह दुरै उभकै री । गोधन धूरि की धूँधरि मैं तिन्द्री छवि यौं रसखान तकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानौ धुँवा-लपटी लपटै लपकै री ॥' यहाँ गोरज से धूसरित कृष्ण की छवि मे आग के पहाड से बुझकर उठते हुए धुँए के बादल की संभावना की गई है, अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है । इसी प्रकार— 'मैन-मनोहर बैन बजै सु सजे तन सोहत पीत पटा है । यौ दमकै चमकै झमकै दुति दामिन की मनौ स्याम घटा है ए सजनी ब्रजराजकुमार अटा चढि फेरत लाल बटा है । रसखानि मठा मधुरी मुख की मुसकानि करै कुलकानि कटा है ॥' यहाँ पर कृष्ण की पीत-वस्त्र से चमकती हुई क्रांति मे बादल मे चमकती हुई बिजली की संभावना के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है । इस अलंकार के अन्य उदाहरण ये है ।— १ 'टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ।' २. 'नटक ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपै डरपै । मनौ दामिनि सावन के घन मैं निकसै नही भीतर ही तरफै ॥' ३ 'कंचुकी सेत मे जावक बिन्दु बिलौकि मरै मधवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनौ रसखान सु पूत के भूप बधूक के फूलनि ॥' ४. 'जोवन-जोति सु यौ दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ।' ४. अतिशयोक्ति—लोक-मर्यादा के विरुद्ध वर्णन करने को—प्रस्तुत को वढा-चढाकर कहने को—अतिशयोक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने इसका भी सफलता से प्रयोग किया है । यथा— 'या छवि पै रसखानि अब, वारौ कोटि मनोज । जाकी उपमा कविन नहि पाई रहे सुखोज ॥' कृष्ण की छवि की उपमा अभी तक कवियो को नही मिली और वे अभी