रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १२३ ३. उत्प्रेक्षा—जहाँ प्रस्तुत की—उपमेय की—अप्रस्तुत रूप मे—उपमान रूप मे—संभावना की जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । इस अलंकार के प्रयोग मे भावो मे प्रभावशीलता आती है । अत रसखान ने उपमा और रूपक की भाँति इस अलंकार का प्रयोग भी बहुलता से किया है । यथा— 'साँझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन यौं ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजबाम सु लाज सनेह दुरै उभकै री । गोधन धूरि की धूँधरि मैं तिन्द्री छवि यौं रसखान तकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानौ धुँवा-लपटी लपटै लपकै री ॥' यहाँ गोरज से धूसरित कृष्ण की छवि मे आग के पहाड से बुझकर उठते हुए धुँए के बादल की संभावना की गई है, अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है । इसी प्रकार— 'मैन-मनोहर बैन बजै सु सजे तन सोहत पीत पटा है । यौ दमकै चमकै झमकै दुति दामिन की मनौ स्याम घटा है ए सजनी ब्रजराजकुमार अटा चढि फेरत लाल बटा है । रसखानि मठा मधुरी मुख की मुसकानि करै कुलकानि कटा है ॥' यहाँ पर कृष्ण की पीत-वस्त्र से चमकती हुई क्रांति मे बादल मे चमकती हुई बिजली की संभावना के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है । इस अलंकार के अन्य उदाहरण ये है ।— १ 'टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ।' २. 'नटक ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपै डरपै । मनौ दामिनि सावन के घन मैं निकसै नही भीतर ही तरफै ॥' ३ 'कंचुकी सेत मे जावक बिन्दु बिलौकि मरै मधवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनौ रसखान सु पूत के भूप बधूक के फूलनि ॥' ४. 'जोवन-जोति सु यौ दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ।' ४. अतिशयोक्ति—लोक-मर्यादा के विरुद्ध वर्णन करने को—प्रस्तुत को वढा-चढाकर कहने को—अतिशयोक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने इसका भी सफलता से प्रयोग किया है । यथा— 'या छवि पै रसखानि अब, वारौ कोटि मनोज । जाकी उपमा कविन नहि पाई रहे सुखोज ॥' कृष्ण की छवि की उपमा अभी तक कवियो को नही मिली और वे अभी