रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ रसखान-ग्रन्थावली २. रूपक—उपमेय मे उपमान के निषेध-रहित आरोप को रूपक अलकार कहते है । इसके मुख्यतया दो भेद है— साग रूपक और निरग रूपक । जहाँ उपमेय के अवयवो के सहित उपमान के अवयवो का आरोप किया जाता है, वहाँ साग अथवा सावयव रूपक होता है और जहाँ अवयवो से रहित उपमान का उपमेय मे आरोप किया जाता है, वहाँ निरग अथवा निरवयव रूपक अल- कार होता है। रसखान ने इस अलकार का भी प्रचुर मात्रा मे प्रयोग किया है। यथा— 'अति सुन्दर री ब्रजराज कुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइकै लाज की गाँठन खोलत है। सुनि री सजनी अलबेलौ लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है। रसखानि लखे मन वूडि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है ।।' यहाँ सौन्दर्य पर सागर का आरोप किया गया है, पर अवयवो का उल्लेख नही है । अत. यहाँ निरग रूपक है। और— 'नैन दलालनि चौहटैं, मन-मानिक पिय हाथ । रसखान ढोल बजाइकँ, बेच्यौ हिय जिय साथ ।।' यहाँ भी नैनो पर दलालो का, मन पर माणिक का आरोप किया गया है । अत यहाँ पर निरग रूपक अलकार है । 'दमकै रवि कु डल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजत है। मुकताहल-वारन गोपन के सु तो बून्दन की छवि छाजत है। ब्रजवाल नदी उमही रसखानि मयक-वधू दुति लाजत है। यह आवन श्री मनभावन की बरषा जिमि आज विराजत है ।।' इस सवैये मे कृष्ण के आगमन पर वर्षा-ऋतु का आरोप किया गया है । सभी अगो का वर्णन है । अत यहाँ साग रूपक अलकार है। इस अलकार के अन्य उदाहरण ये है— १ 'मत्त भयौ मन सग फिरै रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ।' २. 'लटकी लट यो दृग-मीननि सो वनसी जियवा नट की अटकी ।' ३. 'मो मन-मानिक लै गयौ चित्तै चोर नदनद ।' ४. 'रसखानि महावत रूप सलोने को मारग ते मन मोहत है ।' ५. 'तिरछी वरछी सम मारत है दृग-वान कमान सुकान लग्यौ ।' ६. 'भौह कमान सो जोहन को सर वेधत आनन नन्द को छोनो ।'