रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ रसखान-ग्रन्थावली तक पूर्ण परिश्रम के साथ उस उपमा को खोज रहे हैं । यह कथन प्रस्तुत को बढा-चढाकर कहने का द्योतक है । अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलकार है । इस अलकार के अन्य उदाहरण ये हैं— १. 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौह गुमान हरै । दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पात दरै । रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन सपाधि न जाहि टरै जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तामो कहै सब काम करै ।" २. गोकुल नाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमतिजू पर । बहि गयौ अँसुवान प्रवाह भयौ जल मैं व्रजलोक तिहूहूँ पर । तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर । पूरन ब्रह्म है ध्यान रह्यौ पिय औधि अखैवट पात के ऊपर ॥ ५. विरोधाभास—जहाँ कथन मे विरोध का आभास हो, पर वास्तव मे विरोध न हो, यहाँ विरोधाभास अलकार होता है । रसखान ने इसका कुशलता से प्रयोग किया है । यथा -- 'सकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै । नैक हिये जिहि आवत ही जड मूढ महा रसखान कहावै । जा पर देव अदेव भू-अगना वारत प्रानन प्रानन पावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥' इस सवैये की तीसरी पंक्ति मे प्रयुक्त 'वारत प्रानन प्रानन पावै' ये विरोधाभास अलकार है । इसी प्रकार-- 'एरी चतुर सुजान, भयौ अजान हि जान कै । तजि दीनी पहचान, जान अपनी जान को ॥ मे पी 'भयौ अजान हि जान कै' के कारण विरोधाभास अलकार है । ६ समाधि- जहाँ अचानक और कारणो के आ पडने से काम सुगम हो जाये, वहाँ समाधि अलकार होता है । इसे समहित अलकार भी कहते है । रसखान ने इस अलकार का अधिक प्रयोग नही किया, फिर जो उदाहरण है, वे पूर्णतया प्रभावपूर्ण है । यथा- 'कम कुढ्यौ सुनि वानी अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ । भादव साँकरी आठई को रसखान महाप्रभु देवकी जायौ ।