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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १२५ रैनि अँधेरी मे लै बसुदेव महावन मै अरगै धरि आयौ । काहु न चौजुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ॥’ जिस कृष्ण को योगी भी अपनी जागृत अवस्था में प्राप्त नही कर सकते, वही यशोदा को आसानी से प्राप्त हो गया । अत यहाँ समाधि अलकार है । ७. उल्लेख—जहाँ एक ही वर्णनीय विषय का विभिन्न-भेद से अनेक प्रकार का वर्णन हो, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । निम्नलिखित सवैये मे कृष्ण के अनेक रूपो का वर्णन है— ‘वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन सदाशिव सदा ही भरत ध्यान गाढै है । वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राज रक, जोगी जती है कै सीत सह्यौ अग डाढै है । वेई ब्रजचद रसखानि प्रान प्राननि के, जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढै है । जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन ये, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढै है ॥’ इसी प्रकार— ‘सोई है रास मै नैसुक नाचि कै नाच नचायौ कितौ सबको निज । सोई है की रसखानि किते पउहारनि सूधेँ चितौत न हो छिन । तो पै धौ कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हा हा करी तिन । औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लगर मौडो कनौडो करै किन ॥’ मे भी उल्लेख अलंकार है । ८. अत्युक्ति—सम्पति, सौन्दर्य, शौर्य, औदार्य, सौकुमार्य आदि गुणो के मिथ्या वर्णन को अत्युक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने कृष्ण-प्रीति के प्रतिपादन में इस अलंकार का प्रयोग किया है । यथा— ‘कचन-मदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत । प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत । यद्यिप दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत । ऐसे भये तौ कहा रसखानि जौ साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत इस सवैये मे ककृष्ण की प्रीति बढा-चढाकर वर्णन करने के कारण अत्युक्ति अलंकार है ।

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