रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ रसखान-ग्रन्थावली ६. अपन्हुति—जहाँ प्रकृत का—उपमेय का—निषेध करके अप्रकत का आरोप किया जाता है, वहाँ अपन्हुति अल कार होता है। रसखान ने इस अलंकार का प्रयोग निम्न लिखित सवैये मे किया है। 'है छल की अप्रतीत की सूरति मोड बढावै बिनोद कलाम मे। हाथ न ऐहै कछू रसखान तू क्यो वहकै विप पीवत काम मे है कुच कचन के कलसा नये आम की गाठ मढीक की चाम मे। बैनी नही मृगनैनिन की ये नसैनी लगी यमराज के धाम मे।' यहाँ पर कुच और चोटियो का निषेध करके इन पर आम की गाँठ और नसैनी का आरोप किया गया है। अतः अपन्हुति अलकार है। १०. व्यतिरेक—जहाँ उपमान की अपेक्षा उपमेय के उत्कर्ष का वर्णन किया जाये, वहाँ व्यतिरेक अलकार होता है। यथा— 'धूरि भरे अति सोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अगना पग पैजनी बाजति पीरी कछौटी। वा छवि को रसखानि बिलोकत बारत काम कला निज कोटी। काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सो लै गयो माखन-रोटी।' इस सवैये मे कामदेव के सौन्दर्य की अपेक्षा कृष्ण के सौन्दर्य का उत्कर्षपूर्ण वर्णन है। इसी प्रकार— 'जाको लसै मुख चन्द समान कमानी सी भौह गुमान हरै। दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पाँत दरै। रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै। जिहि नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहै सब काम करै।' इस सवैये मे मृग, खंजन और मीन की अपेक्षा राधा के नेत्रो की शोभा का उत्कर्षपूर्ण वर्णन है। अतः यहाँ व्यक्तिरेक अलकार है। ११. दृष्टांत—जहाँ उपमेय, उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब- प्रतिबिम्ब भाव हो, वहाँ दृष्टात अलकार होता है। यथा— 'जा दिन तै निरख्यो नन्दनन्दन कानि तजी घर बधन छूट्यौ। चारु विलोकनि कीनी सुमार सम्हार गई मन यार ने लूट्यो। सागर को सलिला जिमि धावै न रोकी रहै कुल को पुल टूट्यौ। मत्त भयौ मन संग फिरै रसखान सरूप सुधारस घूट्यो॥" १२. अर्थान्तरन्यास – जहाँ विशेष से सामान्य का, या सामान्य से विशेष्य