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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १२७ का साधर्म्य वा वैधर्म्य के द्वारा समर्थन किया जाये, वहाँ अर्थान्तरन्यास अल- कार होता है । यथा— 'मोहक रूप छकि बन डोलति घूमति री तजि लाज विचारै । बक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै । रगभरी मुख की मुसकान लखे सखी कौन जू देह सम्हारै । ज्यौ अरविन्द हिमन्त-करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।' यहाँ मुसकान विशेष का हिमन्त-करी सामान्य से साधर्म्य के द्वारा समर्थन किया गया है । अत अर्थान्तरन्यास अलकार है । १३. प्रतीप—जहाँ उपमेय को उपमान कलिपत कर लिया जाये, वहाँ प्रतीप अलकार होता है । यथा— 'मोहन के मन की सब जानति जोहन के पग मोहि लियो मन । मोहन सुन्दर आनन चंद ते कुंजन देख्यौ मै स्याम सिरोमन । ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हौ बन । कैसी करौ रसखानि लगी जकरी पकरी पिय के हित को मन ॥' यहाँ चन्द्र की अपेक्षा आनन का उत्कर्ष वर्णित है । अत. प्रतीप अलकार है । इस अलकार के अन्य उदाहरण ये है— १. 'कल काननि कु डल मोरपखा उर पै वनमाल विराजति है । मुरली कर मै अधरा मुसकानि-तरग महाछवि छाजति है । रसखानि लखै तन पीत पटा सत दामिनि की दुति लाजति है । वहि बाँसुरी की धुनि कान परै कुलकानि हियो तजि भाजति है ॥' २. 'सोई हुती पिय की छतियाँ लगि बाल प्रवीन महा मुद मानै । केस खुने घहरै बहरै फहरै छवि देखत मैन अमानै । वा रस मे रसखानि पगी रति रैन जगी अखियाँ अनुमानै । चन्द पे बिम्ब औ बिम्ब पै कैरव कैरव पै मुकता न प्रमानै ।' १४ संदेह—जहाँ किसी वस्तु के सम्बन्ध मे सादृश्य-मूलक संदेह हो, वहाँ संदेह अलकार होता है । यथा— 'वा मुख की मुसकानि भटू अखियानि ते नेकु टरै नहि टारी । जौ पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी । दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ बजमारी । प्रेम की बानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी ॥'

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