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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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११६ रसखान-ग्रन्थावली को इन्होंने बहुत ही सफलता से प्रयोग किया है। यह बात निम्नलिखित विवे- चन से स्वतः सिद्ध हो जाती है । १. अनुप्रास—जहाँ समान व्यंजनों की स्वर-सहित अथवा स्वर-रहित आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है । इसके पाँच भेद माने गये हैं— छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, श्रुत्यनुप्रास, लाटानुप्रास और अन्त्यानुप्रास । जहाँ अनेक वर्णों की एक बार रूपता हो, वहाँ छेकानुप्रास होता है । जहाँ वृत्तिगत अनेक वर्णों का एक वर्ण की अनेक बार समता हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है । जहाँ कण्ठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होने वाले वर्णों की आवृत्ति हो, वहाँ श्रुत्यनुप्रास होता है । जहाँ आवृत्त वाक्यों में तात्पर्य भेद से अर्थ की भिन्नता हो, वहाँ लाटानुप्रास होता है । छन्द की अन्तिम तुक को अन्त्यानुप्रास कहते हैं । रसखान-काव्य में ये सभी भेद उपलब्ध हैं । यथा— 'मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन । पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन । जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल कदंब की डारन । इस सवैये में 'बसौं ब्रज' में 'ब' की, 'गोकुल गाँव' में 'ग' की, 'नित नंद' में 'न' की और, कालिंदी कूल में 'क' वर्णों की आवृत्ति है। अत यहाँ छेकानु- प्रास है । इसी प्रकार— 'संकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं । नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावैं । जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावैं । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरी छाछ पै नाच नचावैं ॥ इसमें 'संकर से सुर' में 'स' की, 'ध्यानन धर्म' में 'ध' की, 'देव अदेव' में 'द' और 'व' की, 'प्रानन पावैं' में 'प' की 'छोहरिया छछिया' में 'छ' की 'नाच नचावै' में 'न' की आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है । वृत्यनुप्रास में वृत्तिगत अनेक वर्णों की या एक वर्ण की अनेक बार समता होती है । यथा— 'सेष गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं । जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावैं ।