रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: ६ . रसखान की अलंकार-योजना 'अलकार' शब्द दो शब्दो के योग से बना है—अलकार, जिसका अर्थ है अलकृत अथवा विभूषित करने वाला । जिस प्रकार शरीर की शोभा के लिए हारादिक का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार वाणी की शोभा के लिए—सशक्त अभिव्यजना के लिए—उपमा आदि अलकारो का प्रयोग किया जाता है । यहाँ पर यह बता देना भी आवश्यक है कि यदि आभूषणो का उचित प्रयोग न होगा तो वे शरीर की शोभा मे बाधक ही होगे । इसी प्रकार वाणी के अलकार भी तभी अभिव्यजना मे सहायक होते है, जब उनका प्रयोग स्वाभाविक रीति से होता है । प्रयत्न साध्य अलकार-प्रयोग काव्य के काव्यत्व को हानि ही पहुँचाते है । अलकारो के मुख्यतया दो भेद माने गये है—शब्दालकार और अर्था- -लकार । जब चमत्कार शब्द पर आश्रित होता है तो वहाँ शब्दालकार माना जाता है और जब वह अर्थ पर आश्रित होता है तो वह अर्थालंकार माना जाता है । कुछ आचार्यो की मान्यता यह है कि शब्दालकार केवल चमत्कारक होते है, भाव-वर्द्धक नही, पर यह मान्यता उचित नही है । स्वाभाविक रीति से प्रयुक्त शब्दालकार भी भावो को सबल बनाते हैं, उनकी प्रेषणीयता में सहायक सिद्ध होते है । रसखान के काव्य मे दोनो ही प्रकार के अलकारो का प्रचुर प्रयोग मिलता है । यहाँ पर यह भी स्मरण रखना चाहिए कि रसखान का साध्य भावो की अभिव्यक्ति थी, चमत्कारों का प्रदर्शन नही । अत इनके काव्य मे प्रयुक्त अलकार भाववर्द्धक है । शब्दालकार रसखान के काव्य मे शब्दालंकारो का प्रयोग प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। अनुप्रास, यमक, सिहावलोकन, वीप्सा, श्लेष, वक्रोक्ति आदि अलंकारें ११५