रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ रसखान-ग्रन्थावली कंचुकी सेत मैं जावक-विन्दु विलोकि मरै मघवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनो रसखान सु भूत के भूप वधूक के फूलनि ॥' अर्थात् राधा के सुन्दर सौन्दर्य की लहरें रति की शोभा के किनारों से जा लगी ह । उसके यौवन की कांति का तो कहना ही क्या ? उसके हृदय पर अनेक वस्त्रो की शोभा सुशोभित है । उसकी श्वेत कंचुकी में लाल रंग के विन्दु को देखकर तो मनुष्य इन्द्र के वज्र की चोट की भांति भारी चोट खाकर मर जाता है । उसके कुचों पर पडा हुआ लाल वस्त्र इस प्रकार प्रतीत हो रहा है मानो वधूक के फूलों से शिव की पूजा की गई हो । राधा की शरीर-कांति इस प्रकार चमकती है जैसे दिये की बाती उकसा दी गई हो— 'वाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियाँ तिरछानि तिया की । टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिन तें द्युति दूनी तिया की । लीहैं तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोवन-जोति सु यौं दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥' राधा के शरीरावयवों के सौन्दर्य-वर्णन मे परम्परागत उपमानो का ही प्रयोग किया गया है । यथा— 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौंह गुमान हरै । दीरघ नैन सरोजहुँ तें मृग खंजन मीन की पाँत दरै । रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै । जिंहि नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहे सब काम करै । इस सवैये मे मुख के लिए चन्द्रमा का, भौंह के लिए कमानी का, नेत्रों के लिए कमल, खंजन, मृग और मीन का उपमान ग्रहण किया गया है । ये उपमान उपर्युक्त उपमेयो के लिए परम्परागत हैं । इस विवेचन के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि यद्यपि रसखान ने सौन्दर्य के दोनो पक्षो का—आन्तरिक पक्ष और वाह्य पक्ष का—वर्णन किया है, पर इनके वर्णन में व्यापकता नही है । गिने-चुने शरीरावयवो की तथा भावों की परम्परागत उपमानो के द्वारा शोभा वर्णित की गई है अत. पुनरावृत्ति भी पाई जाती है । यह पुनरावृत्ति मुक्तक काव्य में किसी प्रकार की बाधा भी नही है । निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि अपनी सौन्दर्य-भावना को व्यक्त करने के लिए कवि ने जिस सीमित क्षेत्र को चुना है, उसमे वे काफी सफल रहे हैं।