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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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शब्द सार्थक है। अतः यहाँ यमक अलंकार है। 'आजु गई हुती भोर ही हौ रसखानि रई वाहि नंद के भौनहि। वाकौ जियौ जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि। तेल लगाइ लगाइ के अंजन भौंहै बनाइ बनाइ डिठौनहि। आलि हमेलनि हारि निहारत वारत ज्यौ पुचकारत छौनहि ॥' इस सवैये की अंतिम पंक्ति मे प्रयुक्त 'वारत' और 'पुचकारत' इन शब्दों मे 'आरत' शब्द की आवृत्ति है। दोनो ही शब्द निरर्थक हैं। अतः यमक अलंकार है। 'लाल लसै पगिया सबके सबके पट कोटि सुगन्धनि भीनै। अंगनि अंग सजै सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने। मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुमार सिंगार सो कीने। मै सिगरे ब्रज केहरि की हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥' यहाँ अंतिम पंक्ति मे 'केहरि' मे 'हरि' और 'हरि' शब्द की आवृत्ति है। 'केहरि' का 'हरि' निरर्थक है। अतः यहाँ पर एक निरर्थक और एक सार्थक पद की आवृत्ति है। यहाँ यमक अलंकार है। यमक के अन्य कुछ उदाहरण ये है— १. 'जो रसना रस ना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन !' २ 'जो पै राखनहार है माखन चाखनहार।' ३. 'बिमल सकल रसखानि मिलि, भई सकल रसखानि। सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥' ४ 'तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है।' ५. 'ताते तिन्है तजि जनि गिर्यौ गुन सौगुन औगुन गाँठि परैगी।' ६ 'सो कवि देखि आनन्दन नन्द जू अंगनि अंग समात न फूलै।' ७ राधिका जी है तो जीहै सबैन तौ पीहै हलाहल नन्द के द्वारै।' ८. 'यो पछितावो यहै जु सखी कि कलंक लग्यौ पर अंक न लागी।' ३. सिहावलोकन—जिस प्रकार सिंह पीछे मुडकर देखता है, उसी प्रकार अलंकार मे एक चरण के वर्णों की दूसरे चरण के प्रारम्भ मे आवृत्ति होती है। इसे संस्कृत आचार्यो ने मुक्तपदग्राह्य यमक कहा है। रसखान-काव्य मे इस अलंकार का केवल एक उदाहरण मिलता है जो यह है—

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