रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ११६ 'भेती जु पै कुबरी ह्याँ सखी भरि लातन मूका वकोटती लेती । लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कीडी पिराइ कै देती। देती नचाइ कै नाच वा रॉड को लाल रिझावन को फल सेती । सेती सदा रसखानि लिये कुबरी के करेजनि सूल सी भेती ॥' इस सवैये मे 'भेती', 'लेती', 'देती' और 'सेती' वर्णों की आवृत्ति है । ४. वीप्सा—जहाँ किसी भाव को सबल बनाने के लिए उन्ही शब्दो की आवृत्ति की जाती है, वहाँ वीप्सा अलंकार होता है । रसखान ने इस अलंकार का भी बडी कुशलता से भावपूर्ण प्रयोग किया है । यथा— 'तै न लख्यौ जब कुंजनि ते बनिके निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री । को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रज-लोग फिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरिवा नट को हियरे भटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ॥' इस सवैये मे 'अटक्यौ' शब्द की तीन बार आवृत्ति के कारण कृष्ण के प्रति गोपी के प्रेम की अधिक प्रगाढता व्यंजित हुई है । इसी प्रकार— 'काननि दै अँगुरी रहिवो जबही मुरली धुनि मद बजै है । मोहनी ताननि सो रसखानि अटा चढि गोधन गैहै तो गैहै । टेरि कहौ सिगरे ब्रज-लोगनि काल्हि कोऊ सु कितौ समुझैहै । माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै न जैहै न जैहै । इस सवैये की चतुर्थ पंक्ति मे 'न जैहै' शब्द की तीन बार आवृत्ति है जो कृष्ण की मुस्कान के आकर्षण को कई गुना बढा देती है । ५ श्लेष—जहाँ कोई शब्द एक से अधिक अर्थों का द्योतन करने के कारण चमत्कारक होता है, वहाँ श्लेष अलंकार होता है । इसके दो भेद किये गये है—सभंग श्लेषऔर अभंग श्लेष । सभंग श्लेष मे पद को भंग करने से एका- धिक अर्थ की प्राप्ति होती है और अभंग श्लेष मे पद को भंग नही करना पडता । सभंग श्लेप की अपेक्षा अभंग श्लेप मे अर्थ की रमणीयता अधिक रहती है । इसीलिए भाव-प्रवण कवियो की रचनाओ मे सभंग श्लेप की अपेक्षा अभंग श्लेप के उदाहरण ही मिला करते है । रसखान मे तो केवल अभंग श्लेप ही मिलता है । यथा— 'ए सजनी लोनो लला, लह्यौ नंद के गेह । चितयौ मृदु मुसकाइ कै, हरी सबै सुधि देह ॥'