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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१२० रसखान-ग्रन्थावली यहाँ पर 'हरी' शब्द के हरण 'करना' और 'प्रसन्न होना' ये दो अर्थ हैं । इसी प्रकार— 'स्याम सघन घन घेरि कै, रस वरस्यौ रसखानि । भई दिमानी पानि करि, प्रेम मद्य मन मानि ॥' इस दोहे मे 'स्याम' और 'रस' शब्द श्लिष्ट है । इसी प्रकार के अन्य उदाहरण भी रसखान-काव्य से प्रस्तुत किये जा सकते है । ६ वक्रोक्ति—जब वक्ता कोई बात कहे और श्रोता उस बात का अन्य अर्थ, जो वक्ता का अभीष्ट नही है, काकु या श्लेप के वल से ग्रहण करता है, तो वक्रोक्ति अलकार होता है । वक्रोक्ति अलकार के दो भेद है — श्लेप वक्रो- क्ति और काकु वक्रोक्ति । श्लेप वक्रोक्ति की अपेक्षा काकु वक्रोक्ति मे अर्थ की अधिक रमणीयता होती है । इसी कारण अनेक आचार्यो ने काकु कक्रोक्ति को अर्थालकारो के अन्तर्गत माना है । रखसान-काव्य मे काकु-वक्रोक्ति के ही उदाहरण मिलते है । यथा— 'कौन ठगौरी भरि हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रग-भीनी । तान सुनी जिनही तिनही तबही तित लाज विदा करि दीनी । धूमै घरि घरि नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी । या ब्रज-मडल मै रसखानि सु कौन भटू जू लटू नही कीनी ॥' इस सवैये की अतिम पक्ति मे गोपी ने अपनी सखी को काकु के द्वारा बताया है कि इस ब्रज-मडल की प्रत्येक गोपी को कृष्ण ने मोहित कर रक्खा है । इसी प्रकार— 'फागुन लाग्यौ सखी जब तै तब तै ब्रज मडल धूम मच्यौ है । नारि नवेली बचै नहि एक विसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है । साँझ सकारे वही रसखानि सुरग गुलाल लै खेल रच्यौ है । को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है ॥' इसमे 'को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है' मे काकुवक्रोक्ति अलकार है । 'वा रसखानि सुनौ सुत्तिकै हियरा सत टूक है फाटि गयो है । जानति है न कछू हम ह्वाँ उनवाँ पढि मत्र कहा धौ दयौ है ।