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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ६७

भागवतकार का उद्देश्य भी भक्ति की दृढ़ता ही है । २ उपदेशात्मक—भागवत के उपदेशात्मक भाग मे हमे श्रीकृष्ण योगेश्वर, उपदेष्टा तथा विज्ञानी के रूप मे मिलते है। श्रीमद्भागवत मे दो प्रकार के उपदेश है—साधारण तथा विशेष । साधारण उपदेश वे उपदेश है जो साधु, महात्माओ, गुरुजनो या मित्रो ने दिए है। इन उपदेशो का अभिप्राय कर्त्तव्यकर्म का अनुष्ठान करते हुए भगवद्भक्ति करना है। विशेष उपदेशो के रूप मे वे स्थल आते है, जहाँ उपदेश किसी व्यक्ति विशेष को विशेष रूप से दिये गए हैं। जैसे उद्धव के प्रति भगवान् के उपदेश, ध्रुव को नारद का उपदेश, चतु श्लोकी भागवत तथा कपिलगीता आदि । ये उपदेश बड़े महत्वपूर्ण है क्योकि इनसे दो बातो की व्याख्या हुई है—परमतत्व की और ज्ञान-भक्ति कर्म की । ३. स्तुत्यात्मक—भागवत का स्तुत्यात्मक भाग भी बडा महत्त्वपूर्ण है क्योकि इसके द्वारा भी कृष्ण के वास्तविक रूप की व्याख्या की गई है । ये स्तुतियाँ दो प्रकार की है—सकाम और निष्काम । सकाम स्तुतियाँ वे है जो किसी कामना से प्रेरित होकर की गई है। जैसे—कारागार से मुक्त होने के लिए, किसी आपत्ति या दैहिक, दैविक, भौतिक तापो की निवृत्ति के लिए की गई है। निष्काम स्तुतियाँ दो प्रकार की होती है—एक तो वे जिनमे तत्त्व- ज्ञान की प्रधानता है और दूसरी वे जिनमे साधन की प्रधानता है। वेद-स्तुति तत्वज्ञान-प्रधान स्तुति कही जायेगी, क्योकि इसमे सब तत्वो का पर्यवसान एक ही तत्त्व मे दिखाया गया है। प्रह्लाद अम्बरीष, ब्रह्मा, ध्रुव आदि की स्तुतिया साधन-प्रधान कही जायेगी क्योकि इनमे भक्त मुक्ति का इच्छुक न होकर केवल भगवान के रूप तथा लीला के स्मरण, कीर्तन मे आनन्द लेता है। ४ गीतात्मक—श्रीमद्भागवत का चौथा भाग गीतात्मक है। इन गीतों मे ग्रन्थकार का हृदय साक्षात् रूप से द्रवित होता हुआ प्रतीत होता है। उसकी अन्तरात्मा इन गीतो मे पूर्णरूपेण प्रस्फुटित है। ये हृदय के वे स्वत प्रवाही स्रोत हैं जिनका अवरोध कवि के वश की बात नही थी । उसकी आत्मा की व्यथा एव अन्तर्वेदना के ये गीत साकार प्रतिबिम्ब है। प्रेम और विरह की भावनाओ से ओतप्रोत इन गीतो की सख्या अधिक नही है। पाँच गीत गोपियो के तथा एक द्वारिका की कृष्ण-पत्नियो का है । ये छ गीत दशम स्कन्द मे