भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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६६ रसखान-ग्रन्थावली

पश्चात् कृष्ण की सोलह सहस्र रानियो तथा उनके पुत्रो आदि का वर्णन है । वामनपुराण मे कृष्ण जीवन से सम्बद्ध केवल केशी, मुर और कालनेमि के वध की कथाओ का वर्णन है । कूर्मपुराण मे यदुवश वर्णन के अन्तर्गत कृष्ण के पुत्रो की कथा वर्णित है गरुणपुराण के १४८ वे अध्याय मे कृष्ण की लीलाओ का विस्तार पूर्वक वर्णन है । इस पुराण मे कृष्ण-विषयक कथाएँ ये हैं— पूतना-वध, यमलार्जुनोद्धार, गोवर्धन-धारण, केशी-चाणूर-वध, कालिय मर्दन, शकटासुर-वध, कृष्ण की रुक्मिणी सत्यभामा आदि आठ रानियो का उल्लेख और सदीपन गुरु के पास विद्याध्ययन । विष्णुपुराण मे चौथे अंश के पन्द्रहवे अध्याय मे श्रीकृष्ण के जन्म का वर्णन है। पाँचवे अंश मे कृष्ण-चरित का विशेष रूप से अंकन हुआ है। इसमे कृष्ण की लीलाओ के साथ-साथ रासलीला का भी वर्णन है । कृष्ण-चरित से सम्बद्ध भागवतपुराण सब पुराणो से अधिक महत्वपूर्ण है । कृष्णभक्तो ने अपने मार्ग में इसी को आधार के रूप मे ग्रहण किया है । महा- भारत से लेकर पुराणकाल तक जितना भी कृष्ण का विवेचन हुआ है, वह सब इस पुराण मे संग्रहीत है यद्यपि इस पुराण मे कृष्ण के सभी रूप आ गये हैं, पर प्रमुखता रसिकराज कृष्ण की ही है । डा० हरवमलाल शर्मा ने बाल-लीलाओ को छोडकर कृष्ण के शेष जीवन चरित की दृष्टि से भगवत के प्रतिपाद्य को घटनात्मक, उपदेशात्मक, स्तुत्यात्मक और गीतात्मक इन चार भागो मे विभा- जित किया है और इनका विवेचन निम्नलिखित शब्दो मे किया है — १. घटनात्मक—श्रीमदभागवत के वे स्थल घटना-प्रधान स्थल हैं जो ऐति- हासिक घटनाओ का वर्णन करते हैं । परन्तु जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी के चरित्र को चित्रित करते हुए 'रामचरित- मानस मे ग्रन्थ के प्रधान सूत्र भक्ति को नही छोडते और उसी भावना से अभि- भूत होकर अनजाने ही राम के चरित मे अलौकिकता का रूपादेश कर जाते हैं, उसी प्रकार व्यास जी का लक्ष्य भी भगवत भक्त-निरूपण द्वारा भक्तिरस का परिपाक करना है । अतएव भागवतकार ने घटनात्मक स्थलो पर भी भगवान के दिव्य मंगल-स्वरूप की कई बार स्तुति कराई है । जैसे—भोमासुर-वध के समय, वाणासुर-सग्राम के समय तथा वेद-स्तुति आदि । इन घटनाओ मे अलौ- किक घटनाओ का भी सम्मिश्रण है। जैसे स्वर्ग से कल्पवृक्ष लाना, देवकी के मृतक पुत्रो को लाना आदि । ऐसे स्थलो पर कवि की प्रतिभा सजग हो उठती है और वह भगवान के स्वरूप मे इतना तन्मय हो जाता है कि अन्य सब भाव अभिभूत हो जाते हैं तथा हृद्यानुभूति रागात्मिका वृत्ति के साथ उन स्तुतियो और स्तोत्रो के रूप मे साक्षात् रूप धारण कर लेती है । श्रीमद्भागवत मे जहाँ-जहाँ भी इन घटनाओ का उल्लेख है, वही वही कवि की इस अनुभूति का परिचय मिलता है । इस घटनात्मक भाग मे