रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ रसखान-ग्रन्थावली 'फूलत फूल सबै बन बागन बोलत भोर बसंत के आवत। कोयल की किलकार सुने सब कत बिदेसन तें सब धावत। ऐसे कठोर महा रसखानि जु नेकहु मोरी ये पीर न पावत। हूक सी सालत है हिय मैं जब बैरिन कोयल कूक सुनावत॥' प्रिय का पथ देखते-देखते विरहिणी की आँखें धुँधली पड़ गई हैं। जीभ उसके गुणों को रटते-रटते थक गई है, लेकिन अभी तक प्रिय के आने का कोई सन्देश ही नही मिलता है— 'मग हेरत धूंधरे नैन भये रसना रट वा गुन गावन की। अंगुरी गनि हार थकी सजनी सगुनोती चलै नहि पायन की। पथिको कोउ ऐसो जु नाहि कहै सुधि है रसखान के आवन की। मनभावन आवन सावन मैं कही औधि रही दृग बायन की॥' इस प्रकार हम देखते हैं कि रसखान के वियोग-वर्णन में स्वाभाविकता और प्रभावोत्पादकता है। लेकिन सर्वत्र ऐसा नही हुआ है। कहीं-कहीं रसखान पर रीतिकालीन जादू सर पर चढ़कर बोल उठा है। ऐसे स्थलों पर उनका वर्णन ऊहात्मक बन गया है। यथा — 'विरहा की जु आंच लगी तन में तब जाय परी जमुना जल मे। विरहानल तें जल सूखि गयो मछरी बहि छांटि गई तल मे। जब रेत फटी रु पतार गई तब सेस जरयो धरती तल मे। रसखान तबै ओह आंच मिटी जब आय के स्याम लगे गल मे॥' × × × × 'गोकुलनाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमति जू पर। बढ़ि गयो अँसुवान प्रवाह भयो जल मे ब्रजलांक तिहू पर। तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर। पूरन ब्रह्म ह्वै ध्यान रह्यो पिय औधि असैवट पात के ऊपर॥' लेकिन ऐसे स्थल कम ही हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रसखान ने अपने काव्य मे केवल एक रस की—श्रृंगार रस की—योजना की है और इसमे ये भावुकता एवं स्वाभाविकता की दृष्टि से भी और परम्परा के पालन की दृष्टि से भी पूर्णतया सफल सिद्ध हुए हैं।