रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
भित है । काले रेशम की डोरियो मे बँधे हुए गुंज पलाश-पुष्प की भाँति शोभा से सम्पन्न है । उसके मोती कदम्ब और आम की मजरियो के समान शोभाय- मान है । उसकी वाणी मे इतना माधुर्य हे कि उसके वचनो को सुनकर कोयल भी लज्जित हो जाती है । 'तन चदन खोर कै बैठी भटू रही आजु सुधा की सुता मनसी । मनौ इंदुवधून लजावन कौ सब ज्ञानिन काढि धरी गन-सी । रसखानि विराजति चौकी कुचौ विच उत्तमताहि जरी तन-सी । दमकै दृग-बान के घायन कौ गिरि सेत के संधि के जीवन-सी ॥' अपने शरीर पर चन्दन लगाकर बैठी हुई वह सुधा की मानस-पुत्री राधा ऐसी प्रतीत हो रही है मानो चन्द्रमा की पत्नियो तारिकाओ को लज्जित करने के लिए सब प्रकार से अपनी समग्र सात्विक शोभा को बाहर निकालकर बैठी हुई हो । उसके कुचो के बीच मे हार का चदा इस प्रकार सुशोभित है जैसे सौन्दर्य को ही उसके शरीर मे जड दिया गया हो । वह चन्दा ऐसा प्रतीत होता है मानो दृग वाणो का घाव दमक रहा हो, अथवा श्वेत पर्वत के संधि- स्थान मे कोई जलाशय हो । 'आज सँवारति नेकु भटू तन, मद करी रति की दुति लाजै । देखत रीझि रहे रसखानि सु, और कहा विधिना उपराजै । आए है न्यौते तरैयन के मनो सग पतग पतग जुराजै । ऐसे लसै मुकुतागन मै तिल तेरे तरौना के तीर विराजै ॥' कोई गोपी राधा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि ! आज तनिक अपना शरीर सभाल लो, क्योकि इसके समक्ष रति का सौन्दर्य भी मद हो गया है और वह इसी कारण लज्जित हो रही है । आनन्द- सागर कृष्ण तुम्हारी शोभा को देखकर रीझ रहे है । तुम ब्रह्मा की सौन्दर्य- सृष्टि की चरम पराकाष्ठा हो । मोतियो से युक्त तुम्हारे तरौना के किनारे पर सुशोभित तिल इस प्रकार शोभा दे रहा है मानो सूर्य के साथ सारे नक्षत्र आकर एकत्र हो गये हो । यह राधिका का स्वाभाविक सौन्दर्य है, किन्तु कवि ने उस सौन्दर्य का भी वर्णन किया है जो आभूषणो एव परिधानो के कारण द्विगुणित हो रहा है । यथा — 'प्यारी की चारु सिगार तरगन जाय लगी रति की दुति कूलनि । जोवन जेव कहा कहिए उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि ।
११४ रसखान-ग्रन्थावली कंचुकी सेत मैं जावक-विन्दु विलोकि मरै मघवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनो रसखान सु भूत के भूप वधूक के फूलनि ॥' अर्थात् राधा के सुन्दर सौन्दर्य की लहरें रति की शोभा के किनारों से जा लगी ह । उसके यौवन की कांति का तो कहना ही क्या ? उसके हृदय पर अनेक वस्त्रो की शोभा सुशोभित है । उसकी श्वेत कंचुकी में लाल रंग के विन्दु को देखकर तो मनुष्य इन्द्र के वज्र की चोट की भांति भारी चोट खाकर मर जाता है । उसके कुचों पर पडा हुआ लाल वस्त्र इस प्रकार प्रतीत हो रहा है मानो वधूक के फूलों से शिव की पूजा की गई हो । राधा की शरीर-कांति इस प्रकार चमकती है जैसे दिये की बाती उकसा दी गई हो— 'वाँकी मरोर गही भृकुटीन लगी अँखियाँ तिरछानि तिया की । टाँक सी लाँक भई रसखानि सुदामिन तें द्युति दूनी तिया की । लीहैं तरंग अनंग की अगनि ओप उरोज उठी छतिया की । जोवन-जोति सु यौं दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ॥' राधा के शरीरावयवों के सौन्दर्य-वर्णन मे परम्परागत उपमानो का ही प्रयोग किया गया है । यथा— 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौंह गुमान हरै । दीरघ नैन सरोजहुँ तें मृग खंजन मीन की पाँत दरै । रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै । जिंहि नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहे सब काम करै । इस सवैये मे मुख के लिए चन्द्रमा का, भौंह के लिए कमानी का, नेत्रों के लिए कमल, खंजन, मृग और मीन का उपमान ग्रहण किया गया है । ये उपमान उपर्युक्त उपमेयो के लिए परम्परागत हैं । इस विवेचन के उपरान्त यह कहा जा सकता है कि यद्यपि रसखान ने सौन्दर्य के दोनो पक्षो का—आन्तरिक पक्ष और वाह्य पक्ष का—वर्णन किया है, पर इनके वर्णन में व्यापकता नही है । गिने-चुने शरीरावयवो की तथा भावों की परम्परागत उपमानो के द्वारा शोभा वर्णित की गई है अत. पुनरावृत्ति भी पाई जाती है । यह पुनरावृत्ति मुक्तक काव्य में किसी प्रकार की बाधा भी नही है । निष्कर्ष रूप मे कहा जा सकता है कि अपनी सौन्दर्य-भावना को व्यक्त करने के लिए कवि ने जिस सीमित क्षेत्र को चुना है, उसमे वे काफी सफल रहे हैं।
: ६ . रसखान की अलंकार-योजना 'अलकार' शब्द दो शब्दो के योग से बना है—अलकार, जिसका अर्थ है अलकृत अथवा विभूषित करने वाला । जिस प्रकार शरीर की शोभा के लिए हारादिक का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार वाणी की शोभा के लिए—सशक्त अभिव्यजना के लिए—उपमा आदि अलकारो का प्रयोग किया जाता है । यहाँ पर यह बता देना भी आवश्यक है कि यदि आभूषणो का उचित प्रयोग न होगा तो वे शरीर की शोभा मे बाधक ही होगे । इसी प्रकार वाणी के अलकार भी तभी अभिव्यजना मे सहायक होते है, जब उनका प्रयोग स्वाभाविक रीति से होता है । प्रयत्न साध्य अलकार-प्रयोग काव्य के काव्यत्व को हानि ही पहुँचाते है । अलकारो के मुख्यतया दो भेद माने गये है—शब्दालकार और अर्था- -लकार । जब चमत्कार शब्द पर आश्रित होता है तो वहाँ शब्दालकार माना जाता है और जब वह अर्थ पर आश्रित होता है तो वह अर्थालंकार माना जाता है । कुछ आचार्यो की मान्यता यह है कि शब्दालकार केवल चमत्कारक होते है, भाव-वर्द्धक नही, पर यह मान्यता उचित नही है । स्वाभाविक रीति से प्रयुक्त शब्दालकार भी भावो को सबल बनाते हैं, उनकी प्रेषणीयता में सहायक सिद्ध होते है । रसखान के काव्य मे दोनो ही प्रकार के अलकारो का प्रचुर प्रयोग मिलता है । यहाँ पर यह भी स्मरण रखना चाहिए कि रसखान का साध्य भावो की अभिव्यक्ति थी, चमत्कारों का प्रदर्शन नही । अत इनके काव्य मे प्रयुक्त अलकार भाववर्द्धक है । शब्दालकार रसखान के काव्य मे शब्दालंकारो का प्रयोग प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। अनुप्रास, यमक, सिहावलोकन, वीप्सा, श्लेष, वक्रोक्ति आदि अलंकारें ११५
११६ रसखान-ग्रन्थावली को इन्होंने बहुत ही सफलता से प्रयोग किया है। यह बात निम्नलिखित विवे- चन से स्वतः सिद्ध हो जाती है । १. अनुप्रास—जहाँ समान व्यंजनों की स्वर-सहित अथवा स्वर-रहित आवृत्ति हो, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है । इसके पाँच भेद माने गये हैं— छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, श्रुत्यनुप्रास, लाटानुप्रास और अन्त्यानुप्रास । जहाँ अनेक वर्णों की एक बार रूपता हो, वहाँ छेकानुप्रास होता है । जहाँ वृत्तिगत अनेक वर्णों का एक वर्ण की अनेक बार समता हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है । जहाँ कण्ठ, तालु आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होने वाले वर्णों की आवृत्ति हो, वहाँ श्रुत्यनुप्रास होता है । जहाँ आवृत्त वाक्यों में तात्पर्य भेद से अर्थ की भिन्नता हो, वहाँ लाटानुप्रास होता है । छन्द की अन्तिम तुक को अन्त्यानुप्रास कहते हैं । रसखान-काव्य में ये सभी भेद उपलब्ध हैं । यथा— 'मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन । पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन । जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल कदंब की डारन । इस सवैये में 'बसौं ब्रज' में 'ब' की, 'गोकुल गाँव' में 'ग' की, 'नित नंद' में 'न' की और, कालिंदी कूल में 'क' वर्णों की आवृत्ति है। अत यहाँ छेकानु- प्रास है । इसी प्रकार— 'संकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं । नैक हिये जिहि आनत ही जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावैं । जा पर देव अदेव भू-अंगना वारत प्रानन प्रानन पावैं । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरी छाछ पै नाच नचावैं ॥ इसमें 'संकर से सुर' में 'स' की, 'ध्यानन धर्म' में 'ध' की, 'देव अदेव' में 'द' और 'व' की, 'प्रानन पावैं' में 'प' की 'छोहरिया छछिया' में 'छ' की 'नाच नचावै' में 'न' की आवृत्ति होने से छेकानुप्रास है । वृत्यनुप्रास में वृत्तिगत अनेक वर्णों की या एक वर्ण की अनेक बार समता होती है । यथा— 'सेष गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं । जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावैं ।
समीक्षा भाग ११७ नारद से सुनि व्यास रहे पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥' इस सवैये मे 'स', 'अ' 'द', 'प', और 'घ' वर्ग की अनेक बार आवृत्ति है । अतः यहाँ कोमलावृत्ति से युक्त वृत्यनुप्रास है । इसी प्रकार- 'गावै गुनि गनिका गंधरब औ सारद सेष सबै गुन गावत ।' मे 'ग' और 'स' वर्ण की अनेक बार आवृत्ति होने के कारण वृत्यनुप्रास है । वृत्यनुप्रास के अन्य उदाहरण ये है- १ 'साज समाज सबै सिरताज औ छाज की बात नही कहि आवै ।' - - २ 'सेष सुरेस दिनेस गनेस अजेस धनेस महेस मनावौ । ३. 'है कुछ कचन के कलसा न ये आम की गाँठ मढीक की चाम मे ।' ४. 'लाडली लाल लसै लखियै अलि पुंजनि कुंजनि मै छवि गाढी ।' ५ 'बालन लाल लिये बिहरै छहरै वर मोरपखी सिर ठाढी ।' 'मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी । अग ही अग जराव लसै अरु सीस लसै पगिया जरतारी । पूरब पुन्यनि ते रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी । चार्यौ दिसनि को लै छबि आनि कै झाँके झरोखे मै बाँके बिहारी ॥' इस सवैये मे 'त, न, ल' वर्ग दन्त्य स्थान के, 'ट और र, मूर्धन्य स्थान के 'प ब, म' औष्ठ्य स्थान के है। अतः यहाँ श्रुत्यनुप्रास है । ५. यमक- जहाँ एक ही शब्द की दो बार आवृत्ति हो, किन्तु आवृत्त शब्द भिन्नार्थक हो, वहाँ यमक अलकार होता है । यह आवृत्ति तीन प्रकार से हो सकती है- १. जहाँ दोनो शब्द सार्थक हो । २. जहाँ दोनो शब्द निरर्थक हो । ३. जहाँ एक शब्द सार्थक औन एक निरर्थक हो । रसखान के काव्य मे तीनो प्रकार के यमक पाये जाते है । 'बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सो सानी । हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु वही अनुजानी । जान वही उन आन के सग औ मान वही जु करै मनमानी । त्यौ रसखानि वही रसखानि जु है रसखानि सो है रसखानी ॥' इस सवैये की अंतिम पक्ति मे 'रसखानि शब्द की आवृत्ति है । दोनो
शब्द सार्थक है। अतः यहाँ यमक अलंकार है। 'आजु गई हुती भोर ही हौ रसखानि रई वाहि नंद के भौनहि। वाकौ जियौ जुग लाख करोर जसोमति को सुख जात कह्यौ नहि। तेल लगाइ लगाइ के अंजन भौंहै बनाइ बनाइ डिठौनहि। आलि हमेलनि हारि निहारत वारत ज्यौ पुचकारत छौनहि ॥' इस सवैये की अंतिम पंक्ति मे प्रयुक्त 'वारत' और 'पुचकारत' इन शब्दों मे 'आरत' शब्द की आवृत्ति है। दोनो ही शब्द निरर्थक हैं। अतः यमक अलंकार है। 'लाल लसै पगिया सबके सबके पट कोटि सुगन्धनि भीनै। अंगनि अंग सजै सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने। मुकता गलमाल लसै सब के सब ग्वार कुमार सिंगार सो कीने। मै सिगरे ब्रज केहरि की हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥' यहाँ अंतिम पंक्ति मे 'केहरि' मे 'हरि' और 'हरि' शब्द की आवृत्ति है। 'केहरि' का 'हरि' निरर्थक है। अतः यहाँ पर एक निरर्थक और एक सार्थक पद की आवृत्ति है। यहाँ यमक अलंकार है। यमक के अन्य कुछ उदाहरण ये है— १. 'जो रसना रस ना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन !' २ 'जो पै राखनहार है माखन चाखनहार।' ३. 'बिमल सकल रसखानि मिलि, भई सकल रसखानि। सोई नव रसखानि को, चित चातक रसखानि ॥' ४ 'तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है।' ५. 'ताते तिन्है तजि जनि गिर्यौ गुन सौगुन औगुन गाँठि परैगी।' ६ 'सो कवि देखि आनन्दन नन्द जू अंगनि अंग समात न फूलै।' ७ राधिका जी है तो जीहै सबैन तौ पीहै हलाहल नन्द के द्वारै।' ८. 'यो पछितावो यहै जु सखी कि कलंक लग्यौ पर अंक न लागी।' ३. सिहावलोकन—जिस प्रकार सिंह पीछे मुडकर देखता है, उसी प्रकार अलंकार मे एक चरण के वर्णों की दूसरे चरण के प्रारम्भ मे आवृत्ति होती है। इसे संस्कृत आचार्यो ने मुक्तपदग्राह्य यमक कहा है। रसखान-काव्य मे इस अलंकार का केवल एक उदाहरण मिलता है जो यह है—
समीक्षा भाग ११६ 'भेती जु पै कुबरी ह्याँ सखी भरि लातन मूका वकोटती लेती । लेती निकारि हिये की सबै नक छेदि कै कीडी पिराइ कै देती। देती नचाइ कै नाच वा रॉड को लाल रिझावन को फल सेती । सेती सदा रसखानि लिये कुबरी के करेजनि सूल सी भेती ॥' इस सवैये मे 'भेती', 'लेती', 'देती' और 'सेती' वर्णों की आवृत्ति है । ४. वीप्सा—जहाँ किसी भाव को सबल बनाने के लिए उन्ही शब्दो की आवृत्ति की जाती है, वहाँ वीप्सा अलंकार होता है । रसखान ने इस अलंकार का भी बडी कुशलता से भावपूर्ण प्रयोग किया है । यथा— 'तै न लख्यौ जब कुंजनि ते बनिके निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री । को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रज-लोग फिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरिवा नट को हियरे भटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ॥' इस सवैये मे 'अटक्यौ' शब्द की तीन बार आवृत्ति के कारण कृष्ण के प्रति गोपी के प्रेम की अधिक प्रगाढता व्यंजित हुई है । इसी प्रकार— 'काननि दै अँगुरी रहिवो जबही मुरली धुनि मद बजै है । मोहनी ताननि सो रसखानि अटा चढि गोधन गैहै तो गैहै । टेरि कहौ सिगरे ब्रज-लोगनि काल्हि कोऊ सु कितौ समुझैहै । माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै न जैहै न जैहै । इस सवैये की चतुर्थ पंक्ति मे 'न जैहै' शब्द की तीन बार आवृत्ति है जो कृष्ण की मुस्कान के आकर्षण को कई गुना बढा देती है । ५ श्लेष—जहाँ कोई शब्द एक से अधिक अर्थों का द्योतन करने के कारण चमत्कारक होता है, वहाँ श्लेष अलंकार होता है । इसके दो भेद किये गये है—सभंग श्लेषऔर अभंग श्लेष । सभंग श्लेष मे पद को भंग करने से एका- धिक अर्थ की प्राप्ति होती है और अभंग श्लेष मे पद को भंग नही करना पडता । सभंग श्लेप की अपेक्षा अभंग श्लेप मे अर्थ की रमणीयता अधिक रहती है । इसीलिए भाव-प्रवण कवियो की रचनाओ मे सभंग श्लेप की अपेक्षा अभंग श्लेप के उदाहरण ही मिला करते है । रसखान मे तो केवल अभंग श्लेप ही मिलता है । यथा— 'ए सजनी लोनो लला, लह्यौ नंद के गेह । चितयौ मृदु मुसकाइ कै, हरी सबै सुधि देह ॥'
१२० रसखान-ग्रन्थावली यहाँ पर 'हरी' शब्द के हरण 'करना' और 'प्रसन्न होना' ये दो अर्थ हैं । इसी प्रकार— 'स्याम सघन घन घेरि कै, रस वरस्यौ रसखानि । भई दिमानी पानि करि, प्रेम मद्य मन मानि ॥' इस दोहे मे 'स्याम' और 'रस' शब्द श्लिष्ट है । इसी प्रकार के अन्य उदाहरण भी रसखान-काव्य से प्रस्तुत किये जा सकते है । ६ वक्रोक्ति—जब वक्ता कोई बात कहे और श्रोता उस बात का अन्य अर्थ, जो वक्ता का अभीष्ट नही है, काकु या श्लेप के वल से ग्रहण करता है, तो वक्रोक्ति अलकार होता है । वक्रोक्ति अलकार के दो भेद है — श्लेप वक्रो- क्ति और काकु वक्रोक्ति । श्लेप वक्रोक्ति की अपेक्षा काकु वक्रोक्ति मे अर्थ की अधिक रमणीयता होती है । इसी कारण अनेक आचार्यो ने काकु कक्रोक्ति को अर्थालकारो के अन्तर्गत माना है । रखसान-काव्य मे काकु-वक्रोक्ति के ही उदाहरण मिलते है । यथा— 'कौन ठगौरी भरि हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रग-भीनी । तान सुनी जिनही तिनही तबही तित लाज विदा करि दीनी । धूमै घरि घरि नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी । या ब्रज-मडल मै रसखानि सु कौन भटू जू लटू नही कीनी ॥' इस सवैये की अतिम पक्ति मे गोपी ने अपनी सखी को काकु के द्वारा बताया है कि इस ब्रज-मडल की प्रत्येक गोपी को कृष्ण ने मोहित कर रक्खा है । इसी प्रकार— 'फागुन लाग्यौ सखी जब तै तब तै ब्रज मडल धूम मच्यौ है । नारि नवेली बचै नहि एक विसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है । साँझ सकारे वही रसखानि सुरग गुलाल लै खेल रच्यौ है । को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है ॥' इसमे 'को सजनी निलजी न भई अरु कौन भटू जिहि मान बच्यौ है' मे काकुवक्रोक्ति अलकार है । 'वा रसखानि सुनौ सुत्तिकै हियरा सत टूक है फाटि गयो है । जानति है न कछू हम ह्वाँ उनवाँ पढि मत्र कहा धौ दयौ है ।
समीक्षा भाग १२१ साँची कहैं जिय मै निज जानि कै जानति है जस जैसो लयौ है । लोग लुगाई सबै ब्रज माँहि कहै हरि चेरी को चेरो भयो है ॥' यहाँ पर 'जस जैसो लयौ है' मे काकु के द्वारा यह बताया गया है कि वे बहुत बदनाम हो गए है । अत काकु वक्रोक्ति अलकार है । अर्थालंकार रसखान जैसे भावुक कवि की भाषा मे अर्थालंकारो का प्रवाह आ जाना स्वाभाविक है । इनके द्वारा प्रयुक्त कुछ अर्थालंकारो के उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे है । १. उपमा — उपमान और उपमेय के सादृश्य वर्णन मे उपमा अलंकार होता है । रसखान ने इस अलकार का बहुत मात्रा मे और बहुत कुशलता से प्रयोग किया है । यथा— 'सुनियै सबकी कहिये न कछू रहियै इमि या भव-बागर मै । करियै व्रत-नेम सचाई लिये जिनते तरियै भव-सागर मै । मिलियै सबसो दुरभाव बिना रहियै सतसंग उजागर मै । रसखानि गुबिन्दहि कौ भजियै जिमि नागरि कौ चित्त गागर मै ॥' भगवद्-भजन के लिए नागरी के चित्त की एकाग्रता का सादृश्य दिखलाया गया है । अत यहाँ उपमा अलंकार है । इसी प्रकार— 'लाडली लाल लसै लखियै अलि पुंजनि कुंजनि मै छबि गाढी । ऊजरी ज्यौ बिजुरी सी जुरी चहूँ गुजरी केलि-कला सम काढी । त्यौ रसखानि न जानि परै सुखमा तिहुँ लोकन की अति बाढी । बालन लाल लिये बिहरै छहरै बर मोरपखी सिर ठाढी ।' 'ऊजरी ज्यौ बिजुरी सी जुरी चहूँ गुजरी केलि-कला सम काढी' मे उपमा अलंकार है । इस अलंकार के अन्य उदाहरण ये है— १ सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी ।' २. 'ऐचे आवत धनुष से छूटे सर से जाहि ।' ३ 'जा रसखानि बिलोकत ही सहसा ढरि राँग सो अंग ढर्यो है ।' ४ 'तिरछी वरछी सम मारत है दृग-वान कमान सुकान लग्यो ।' ५ 'जाको लसै मुख चन्द समान सुकोमल अंगनि रूप लपेटी ।' ६ 'चन्द सो आनन मैन मनोहर बैन मनोहर मोहत हौ मन ।'
१२२ रसखान-ग्रन्थावली २. रूपक—उपमेय मे उपमान के निषेध-रहित आरोप को रूपक अलकार कहते है । इसके मुख्यतया दो भेद है— साग रूपक और निरग रूपक । जहाँ उपमेय के अवयवो के सहित उपमान के अवयवो का आरोप किया जाता है, वहाँ साग अथवा सावयव रूपक होता है और जहाँ अवयवो से रहित उपमान का उपमेय मे आरोप किया जाता है, वहाँ निरग अथवा निरवयव रूपक अल- कार होता है। रसखान ने इस अलकार का भी प्रचुर मात्रा मे प्रयोग किया है। यथा— 'अति सुन्दर री ब्रजराज कुमार महामृदु बोलनि बोलत है । लखि नैन की कोर कटाछ चलाइकै लाज की गाँठन खोलत है। सुनि री सजनी अलबेलौ लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है। रसखानि लखे मन वूडि गयौ मधि रूप के सिन्धु कलोलत है ।।' यहाँ सौन्दर्य पर सागर का आरोप किया गया है, पर अवयवो का उल्लेख नही है । अत. यहाँ निरग रूपक है। और— 'नैन दलालनि चौहटैं, मन-मानिक पिय हाथ । रसखान ढोल बजाइकँ, बेच्यौ हिय जिय साथ ।।' यहाँ भी नैनो पर दलालो का, मन पर माणिक का आरोप किया गया है । अत यहाँ पर निरग रूपक अलकार है । 'दमकै रवि कु डल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजत है। मुकताहल-वारन गोपन के सु तो बून्दन की छवि छाजत है। ब्रजवाल नदी उमही रसखानि मयक-वधू दुति लाजत है। यह आवन श्री मनभावन की बरषा जिमि आज विराजत है ।।' इस सवैये मे कृष्ण के आगमन पर वर्षा-ऋतु का आरोप किया गया है । सभी अगो का वर्णन है । अत यहाँ साग रूपक अलकार है। इस अलकार के अन्य उदाहरण ये है— १ 'मत्त भयौ मन सग फिरै रसखानि सरूप सुधारस घूट्यौ ।' २. 'लटकी लट यो दृग-मीननि सो वनसी जियवा नट की अटकी ।' ३. 'मो मन-मानिक लै गयौ चित्तै चोर नदनद ।' ४. 'रसखानि महावत रूप सलोने को मारग ते मन मोहत है ।' ५. 'तिरछी वरछी सम मारत है दृग-वान कमान सुकान लग्यौ ।' ६. 'भौह कमान सो जोहन को सर वेधत आनन नन्द को छोनो ।'
समीक्षा भाग १२३ ३. उत्प्रेक्षा—जहाँ प्रस्तुत की—उपमेय की—अप्रस्तुत रूप मे—उपमान रूप मे—संभावना की जाये, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । इस अलंकार के प्रयोग मे भावो मे प्रभावशीलता आती है । अत रसखान ने उपमा और रूपक की भाँति इस अलंकार का प्रयोग भी बहुलता से किया है । यथा— 'साँझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन यौं ललकै री । ऊँची अटान चढी ब्रजबाम सु लाज सनेह दुरै उभकै री । गोधन धूरि की धूँधरि मैं तिन्द्री छवि यौं रसखान तकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानौ धुँवा-लपटी लपटै लपकै री ॥' यहाँ गोरज से धूसरित कृष्ण की छवि मे आग के पहाड से बुझकर उठते हुए धुँए के बादल की संभावना की गई है, अतः उत्प्रेक्षा अलंकार है । इसी प्रकार— 'मैन-मनोहर बैन बजै सु सजे तन सोहत पीत पटा है । यौ दमकै चमकै झमकै दुति दामिन की मनौ स्याम घटा है ए सजनी ब्रजराजकुमार अटा चढि फेरत लाल बटा है । रसखानि मठा मधुरी मुख की मुसकानि करै कुलकानि कटा है ॥' यहाँ पर कृष्ण की पीत-वस्त्र से चमकती हुई क्रांति मे बादल मे चमकती हुई बिजली की संभावना के कारण उत्प्रेक्षा अलंकार है । इस अलंकार के अन्य उदाहरण ये है ।— १ 'टोकत ही टटकार लगी रसखानि भई मनौ कारिख-पेटी ।' २. 'नटक ते सिख नील निचोल लपेटे सखी सम भाँति कँपै डरपै । मनौ दामिनि सावन के घन मैं निकसै नही भीतर ही तरफै ॥' ३ 'कंचुकी सेत मे जावक बिन्दु बिलौकि मरै मधवानि की सूलनि । पूजे है आजु मनौ रसखान सु पूत के भूप बधूक के फूलनि ॥' ४. 'जोवन-जोति सु यौ दमकै उसकाइ दई मनो बाती दिया की ।' ४. अतिशयोक्ति—लोक-मर्यादा के विरुद्ध वर्णन करने को—प्रस्तुत को वढा-चढाकर कहने को—अतिशयोक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने इसका भी सफलता से प्रयोग किया है । यथा— 'या छवि पै रसखानि अब, वारौ कोटि मनोज । जाकी उपमा कविन नहि पाई रहे सुखोज ॥' कृष्ण की छवि की उपमा अभी तक कवियो को नही मिली और वे अभी
१२४ रसखान-ग्रन्थावली तक पूर्ण परिश्रम के साथ उस उपमा को खोज रहे हैं । यह कथन प्रस्तुत को बढा-चढाकर कहने का द्योतक है । अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलकार है । इस अलकार के अन्य उदाहरण ये हैं— १. 'जाको लसै मुख चंद समान कमानी सी भौह गुमान हरै । दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पात दरै । रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन सपाधि न जाहि टरै जिहिं नीके नवै कटि हार के भार सो तामो कहै सब काम करै ।" २. गोकुल नाथ वियोग प्रलै जिमि गोपिन नद जसोमतिजू पर । बहि गयौ अँसुवान प्रवाह भयौ जल मैं व्रजलोक तिहूहूँ पर । तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौ ब्रज भू पर । पूरन ब्रह्म है ध्यान रह्यौ पिय औधि अखैवट पात के ऊपर ॥ ५. विरोधाभास—जहाँ कथन मे विरोध का आभास हो, पर वास्तव मे विरोध न हो, यहाँ विरोधाभास अलकार होता है । रसखान ने इसका कुशलता से प्रयोग किया है । यथा -- 'सकर से सुर जाहि जपै चतुरानन ध्यानन धर्म बढावै । नैक हिये जिहि आवत ही जड मूढ महा रसखान कहावै । जा पर देव अदेव भू-अगना वारत प्रानन प्रानन पावै । ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥' इस सवैये की तीसरी पंक्ति मे प्रयुक्त 'वारत प्रानन प्रानन पावै' ये विरोधाभास अलकार है । इसी प्रकार-- 'एरी चतुर सुजान, भयौ अजान हि जान कै । तजि दीनी पहचान, जान अपनी जान को ॥ मे पी 'भयौ अजान हि जान कै' के कारण विरोधाभास अलकार है । ६ समाधि- जहाँ अचानक और कारणो के आ पडने से काम सुगम हो जाये, वहाँ समाधि अलकार होता है । इसे समहित अलकार भी कहते है । रसखान ने इस अलकार का अधिक प्रयोग नही किया, फिर जो उदाहरण है, वे पूर्णतया प्रभावपूर्ण है । यथा- 'कम कुढ्यौ सुनि वानी अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ । भादव साँकरी आठई को रसखान महाप्रभु देवकी जायौ ।
समीक्षा भाग १२५ रैनि अँधेरी मे लै बसुदेव महावन मै अरगै धरि आयौ । काहु न चौजुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ॥’ जिस कृष्ण को योगी भी अपनी जागृत अवस्था में प्राप्त नही कर सकते, वही यशोदा को आसानी से प्राप्त हो गया । अत यहाँ समाधि अलकार है । ७. उल्लेख—जहाँ एक ही वर्णनीय विषय का विभिन्न-भेद से अनेक प्रकार का वर्णन हो, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । निम्नलिखित सवैये मे कृष्ण के अनेक रूपो का वर्णन है— ‘वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन सदाशिव सदा ही भरत ध्यान गाढै है । वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राज रक, जोगी जती है कै सीत सह्यौ अग डाढै है । वेई ब्रजचद रसखानि प्रान प्राननि के, जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढै है । जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन ये, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढै है ॥’ इसी प्रकार— ‘सोई है रास मै नैसुक नाचि कै नाच नचायौ कितौ सबको निज । सोई है की रसखानि किते पउहारनि सूधेँ चितौत न हो छिन । तो पै धौ कौन मनोहर भाव बिलोकि भयौ बस हा हा करी तिन । औसर ऐसो मिलै न मिलै फिर लगर मौडो कनौडो करै किन ॥’ मे भी उल्लेख अलंकार है । ८. अत्युक्ति—सम्पति, सौन्दर्य, शौर्य, औदार्य, सौकुमार्य आदि गुणो के मिथ्या वर्णन को अत्युक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने कृष्ण-प्रीति के प्रतिपादन में इस अलंकार का प्रयोग किया है । यथा— ‘कचन-मदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत । प्रात ही ते सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत । यद्यिप दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत । ऐसे भये तौ कहा रसखानि जौ साँवरे ग्वार सो नेह न लैयत इस सवैये मे ककृष्ण की प्रीति बढा-चढाकर वर्णन करने के कारण अत्युक्ति अलंकार है ।
१२६ रसखान-ग्रन्थावली ६. अपन्हुति—जहाँ प्रकृत का—उपमेय का—निषेध करके अप्रकत का आरोप किया जाता है, वहाँ अपन्हुति अल कार होता है। रसखान ने इस अलंकार का प्रयोग निम्न लिखित सवैये मे किया है। 'है छल की अप्रतीत की सूरति मोड बढावै बिनोद कलाम मे। हाथ न ऐहै कछू रसखान तू क्यो वहकै विप पीवत काम मे है कुच कचन के कलसा नये आम की गाठ मढीक की चाम मे। बैनी नही मृगनैनिन की ये नसैनी लगी यमराज के धाम मे।' यहाँ पर कुच और चोटियो का निषेध करके इन पर आम की गाँठ और नसैनी का आरोप किया गया है। अतः अपन्हुति अलकार है। १०. व्यतिरेक—जहाँ उपमान की अपेक्षा उपमेय के उत्कर्ष का वर्णन किया जाये, वहाँ व्यतिरेक अलकार होता है। यथा— 'धूरि भरे अति सोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अगना पग पैजनी बाजति पीरी कछौटी। वा छवि को रसखानि बिलोकत बारत काम कला निज कोटी। काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सो लै गयो माखन-रोटी।' इस सवैये मे कामदेव के सौन्दर्य की अपेक्षा कृष्ण के सौन्दर्य का उत्कर्षपूर्ण वर्णन है। इसी प्रकार— 'जाको लसै मुख चन्द समान कमानी सी भौह गुमान हरै। दीरघ नैन सरोजहुँ तै मृग खंजन मीन की पाँत दरै। रसखान उरोज निहारत ही मुनि कौन समाधि न जाहि टरै। जिहि नीके नवै कटि हार के भार सो तासो कहै सब काम करै।' इस सवैये मे मृग, खंजन और मीन की अपेक्षा राधा के नेत्रो की शोभा का उत्कर्षपूर्ण वर्णन है। अतः यहाँ व्यक्तिरेक अलकार है। ११. दृष्टांत—जहाँ उपमेय, उपमान और साधारण धर्म का बिम्ब- प्रतिबिम्ब भाव हो, वहाँ दृष्टात अलकार होता है। यथा— 'जा दिन तै निरख्यो नन्दनन्दन कानि तजी घर बधन छूट्यौ। चारु विलोकनि कीनी सुमार सम्हार गई मन यार ने लूट्यो। सागर को सलिला जिमि धावै न रोकी रहै कुल को पुल टूट्यौ। मत्त भयौ मन संग फिरै रसखान सरूप सुधारस घूट्यो॥" १२. अर्थान्तरन्यास – जहाँ विशेष से सामान्य का, या सामान्य से विशेष्य
समीक्षा भाग १२७ का साधर्म्य वा वैधर्म्य के द्वारा समर्थन किया जाये, वहाँ अर्थान्तरन्यास अल- कार होता है । यथा— 'मोहक रूप छकि बन डोलति घूमति री तजि लाज विचारै । बक विलोकनि नैन विसाल सु दम्पति कोर कटाछन मारै । रगभरी मुख की मुसकान लखे सखी कौन जू देह सम्हारै । ज्यौ अरविन्द हिमन्त-करी झकझोरि कै तोरि मरोरि कै डारै ।' यहाँ मुसकान विशेष का हिमन्त-करी सामान्य से साधर्म्य के द्वारा समर्थन किया गया है । अत अर्थान्तरन्यास अलकार है । १३. प्रतीप—जहाँ उपमेय को उपमान कलिपत कर लिया जाये, वहाँ प्रतीप अलकार होता है । यथा— 'मोहन के मन की सब जानति जोहन के पग मोहि लियो मन । मोहन सुन्दर आनन चंद ते कुंजन देख्यौ मै स्याम सिरोमन । ता दिन ते मेरे नैननि लाज तजी कुलकानि की डोलति हौ बन । कैसी करौ रसखानि लगी जकरी पकरी पिय के हित को मन ॥' यहाँ चन्द्र की अपेक्षा आनन का उत्कर्ष वर्णित है । अत. प्रतीप अलकार है । इस अलकार के अन्य उदाहरण ये है— १. 'कल काननि कु डल मोरपखा उर पै वनमाल विराजति है । मुरली कर मै अधरा मुसकानि-तरग महाछवि छाजति है । रसखानि लखै तन पीत पटा सत दामिनि की दुति लाजति है । वहि बाँसुरी की धुनि कान परै कुलकानि हियो तजि भाजति है ॥' २. 'सोई हुती पिय की छतियाँ लगि बाल प्रवीन महा मुद मानै । केस खुने घहरै बहरै फहरै छवि देखत मैन अमानै । वा रस मे रसखानि पगी रति रैन जगी अखियाँ अनुमानै । चन्द पे बिम्ब औ बिम्ब पै कैरव कैरव पै मुकता न प्रमानै ।' १४ संदेह—जहाँ किसी वस्तु के सम्बन्ध मे सादृश्य-मूलक संदेह हो, वहाँ संदेह अलकार होता है । यथा— 'वा मुख की मुसकानि भटू अखियानि ते नेकु टरै नहि टारी । जौ पलकैं पल लागति है पल ही पल माँझ पुकारै पुकारी । दूसरी ओर ते नेकु चितै इन नैनन नेम गह्यौ बजमारी । प्रेम की बानि कि जोग कलानि गही रसखानि विचार विचारी ॥'
३२८ रसखान-ग्रन्थावली इस सवैये की अन्तिम पंक्ति मे संदेह अलंकार है । इस अलंकार का एक अन्य उदाहरण और देखिये — 'दूध दुह्यौ सीरो पर्यौ तातो न जमायो कर्यो, जामन दयौ सो घर्यौ घर्यौई खटाइगौ । आन हाथ आन पाइ सब ही के तब ही ते, जब ही ते रसखानि ताननि सुनाइगौ । ज्यौही नर त्यौही नारी तैसी यै तरुन वारी, कहियै कहा री सब ब्रज बिललाइ गौ । जानियै न आली यह छोहरा जसोमति को, बांसुरी बजाइगौ कि विष बगदरइ गौ ॥' १५. असंगति—कारण-कार्य की स्वाभाविक संगति के अभाव मे असंगति अलंकार होता है । यथा— 'श्री वृषभान की छान धुजा अटकी लरकान ते झान लई री । वा रसखान के पानि की जानि छुडावति राधिका प्रेम मई री । जीवन-मूरी सी नेम लिये इनहूँ चितयौ उनहूँ चितई री । लाल लली दृग जोरत ही सुरधानि गुडी उरझाय दई री ।'' यहाँ सुलझाने वाली गुडी उलझा देती है । अत असंगति अलंकार है । इस विवेचन के पश्चात् यह कहना कठिन नही कि रसखान की अलंकार- योजना बहुत ही सफल और प्रभाववर्द्धक है । इन्होने अलंकारो का प्रयोग श्रम द्वारा नही किया, वरन् ये तो स्वत भावावेग मे आ गये है । स्वाभाविक रूप से आये हुए अलंकार भाषा मे अधिक प्रभाव और गति उत्पन्न कर देते हैं । यह निर्विवाद मत है । जहाँ अलंकार अभिव्यक्ति के साधन और सहायक होते है, वही इनका प्रयोग सार्थक होता है । रसखान की अलंकार-योजना ऐसी ही है ।
: १० : रसखान की भाषा भाषा भावो की अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। जो कवि जितना अधिक समर्थ होता है, उतना ही अधिक उसका भाषा पर अधिकार होता है। शब्द, अलकार, गुण, छद, लोकोक्ति और मुहावरे भाषा के प्राणदायक अग होते है। अत किसी कवि की भाषा की समीक्षा करने के लिए इन अंगो का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। रसखान की भाषा का विवेचन भी इसी आधार पर करना उचित है। शब्द-योजना यह सच है कि शब्द-समूह से भाषा का निर्माण होता है, पर प्रत्येक शब्द-समूह सफल एव प्रभावशाली भाषा को जन्म नही दे सकता। सफल भाषा के लिए भावानुसारिणी शब्द-योजना की सयोजना भी आवश्यक है। जहाँ तक शब्द-योजना का प्रश्न है, रसखान इस कसौटी पर खरे उतरते है। इनका शब्द-चयन अभीप्सित भावो को व्यक्त करने मे पूर्णतया समर्थ एव सफल है। यथा — ‘बात सुनी न कहूँ हरि की, न कहूँ हरि सो मुख बोल हँसी है। काल्हि ही गोरस बेचन कौ निकसी ब्रजवासिनि बीच सखी है। आजु ही वारक ‘लेहु दही’ कहिकै कछु, नैनन मै बिहँसी है। बैरिनि बाहि भई मुसकानि जुवा रसखान के प्रान बसी है ॥’ यहाँ पर ‘बैरिनि’ शब्द का प्रयोग अत्यन्त सार्थक एव भावपूर्ण है। इस शब्द से आक्रोश और आत्मीयता दो विरोधी भाव परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हो गये है। ‘अत मे न लयौ माही गाँवरे को जायौ, माई बापरे जिवायौ प्याइ दूध वारे-वारे को। १२६
१३० रसखान-ग्रन्थावली सोई रसखानि पहिचानि कानि छांड़ि चाहे, लोचन नचावत नचैया द्वारे-द्वारे को।' मैया की सी सोच कछु मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर भीरि द्वारे को। सहै दुख भारी गहै डगर हमारी मांझ, नयर हमारे ग्वाल वगर हमारे को।।' इस कवित्त मे शब्दो की योजना अत्यन्त भावपूर्ण है। 'नचैया' शब्द आत्मीयता का सूचक है। 'कान्ह भरा वस वांसुरी के अब कौन सखी हमको चहि है। निसद्योस रहे सग-साथ लगी यह सौतिन तापन क्यों सहि है। जिन मोहि लियों मनमोहन को रसखानि सदा हमको दहि है। मिलि आयो सबै सखी' भागि चले अब तो ब्रज मे वंसुरी रहि है ॥' इस सवैये मे वांसुरी के प्रति गोपियो का सपत्नी-भाव व्यंजित है। इसमे 'कौन' शब्द कृष्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है जो अत्यन्त आत्मीयता का सूचक है। 'मनमोहन' शब्द का प्रयोग भी साभिप्राय है, इससे वांसुरी की महत्ता सूचित होती है, क्योंकि जो कृष्ण सबका मन मोहने के कारण मनमोहन बने हुए है, वे स्वयं वांसुरी द्वारा मोहित कर लिये गए है। 'मिलि आयो सबी' मे सभी सखियो के दुख की तथा समान दुख होने से उनकी एकता की व्यंजना होती है। 'कल काननि कु डल मोरपखा उर पै वनमाल बिराजति है। मुरली कर मैं अधरा मुसकानि-तरग महाछवि छाजति है। रसखानि लखें तन पीत पटा सत दामिनि की दुति लाजति है। वहि बांसुरी की धुनि कानि परें कुल-कानि हियो तजि भाजति है॥' इसमे 'वहि' शब्द का प्रयोग बांसुरी के उन प्रभावो की ओर संकेत करता है जिनसे प्रभावित होकर गोपियाँ अपने कुल की लाज छोड़कर कृष्ण के आगे पीछे दौड़ने लगती हैं। शब्द-योजना के द्वारा वर्ण्य वस्तु का चित्र प्रस्तुत करने मे भी रसखान सिद्धहस्त दिखाई पडते है। चित्रात्मकता का यह उदाहरण देखिए— 'जल की न घट परै पग की न पग घरै, घर की न कछु करै बैठी भरै सांमु री।
समीक्षा भाग १३१ एकै सुनि लोट गई एकै लोट-पोट भई, एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री। कहै रसखानि सो सबै ब्रज-बनिता बधि, बधिक कहाय हाय भई कुल हाँसु री। करिये उपाय बाँस डारियै कटाय, नाहि उपजैगौ बाँस नाहि वाजे फेरि बाँसुरी॥' रसखान की शब्द-योजना भावाभिव्यक्ति मे पूर्णतया समर्थ एव सफल है। साग रूपक की योजना प्रस्तुत करते समय प्रायः दुरूहता आ जाती है, पर रसखान के काव्य मे यह दोष भी दिखाई नहीं देता। वर्षा-विषयक यह सांग रूपक देखिए— 'दमकै रवि कुंडल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजति है। मुकताहल-वारन गोपन के सु तौ बूँदन की छवि छाजत है। ब्रजबाल नदी उमही रसखानि मयकवधू-दुति लाजत है। यह आवन श्री मनभावन की बरखा जिमि आज बिराजत है॥' संगीतात्मकता भी रसखान की शब्द योजना की एक प्रमुख विशेषता है। प्रत्येक शब्द अपने स्थान पर इस प्रकार बिठाया गया है कि क्या मजाल, कही भी संगीतात्मकता को क्षति पहुँचे अथवा जिह्वा तथा स्वर की गति मे बाधा पडे। रसखान का समूचा काव्य इसका उदाहरण है, फिर भी दो सवैये प्रस्तुत हैं— १ 'नद को 'दन है दुसकदन प्रेम के फदन बाँधि लई हौ। एक दिना ब्रजराज के मदिर मेरी अली इक बार भई हौ। हेर्यौ लला ललचाइ कै मोहन जोहन की चकडोर पई हौ। दौरी फिरौ दृग डोरनि मैं हिय मै अनुराग की वेलि बई हौ॥' २. 'दृग दूने खिचे रहे कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही। छकि छैल छबीली घटा लहराइ कै कौतुक कोटि दिखाइ रही। झुकि भूमि झमाकनि चूमि भ्रमी चहि चाँदनी चंद चुराइ रही। मन पाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही॥' इस विवेचन के उपरात यह कहना अन्यथा न होगा कि रसखान की शब्द-योजना भावानुसारिणी, भावाभिव्यजक एव सफल है।
१३२ रसखान-ग्रन्थावली अलंकार-योजना काव्य मे अलकारो का प्रयोग भाव-समृद्धि के लिए किया जाता है । जो अलकार श्रमसाध्य होते हैं, अथवा भाव-सौन्दर्य मे किसी प्रकार से सहायक नही होते, वे हेय समझे जाते है । सफल कवियो की वाणी मे भावो के साथ अलंकार भी स्वत फूटते चलते है । अलकारो का यह स्वत. स्फुटन काव्य और साहित्य की अमर एव भव्य निधि है । अलकारो के मुख्यतया दो भेद किये गये है—शब्दालंकार और अर्था- लंकार । जो अलकार शब्दाश्रित होते है, उन्हे शब्दालंकार और जो अर्थाश्रित होते है, उन्हे अर्थालंकार कहते है । रसखान ने दोनो प्रकार के अलकारो का ही प्रयोग किया है । पहले हम शब्दालंकारो को लेते हैं । शब्दालंकारो मे रसखान ने अनुप्रास और यमक का सबसे अधिक प्रयोग किया है । इस प्रयोग को देखकर यदि इन्हे अनुप्रास और यमक सम्राट् कहा जाये तो अनुचित न होगा । अनुप्रास के कुछ उदाहरण प्रस्तुत है . 'गावैं गुनी गनिका गंधरब्ब औ सारद सेस सबै गुन गावत । नाम अनंत गनत गनेस ज्यौ ब्रह्म त्रिलोचन पार न पावत । जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरंतर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोहरिया छछिया परि छाछ पै नाच नचावत ।।' इस सवैये मे 'ग', 'स', 'न' 'त', 'प', 'ज', 'द' और 'न' वर्णो की आवृत्ति है । अत यह वृत्यनुप्रास है । मानुष हौं तौ वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन । जो पसु हौं तौ कहा बस मेरो चरौं नित नद की धेनु मंझारन । पाहन हौं तो वही गिरि को जो धर्यो कर छत्र पुरन्दर धारन । जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिन्दी कूल-कदम्ब की डारन ।।' इस सवैये मे 'व', 'ग', 'न' और 'क' वर्ण की आवृत्ति है । यह छेकानु- प्रास है । अनुप्रास की भाँति रसखान ने यमक का भी प्रचुरता से प्रयोग किया है । यमक के मुख्यतया तीन भेद होते है— १. जहाँ दोनो आवृत्त वर्ग सार्थक हो । २. जहाँ दोनो आवृत्त वर्ग निरर्थक हो ।