रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० रसखान-ग्रन्थावली सोई रसखानि पहिचानि कानि छांड़ि चाहे, लोचन नचावत नचैया द्वारे-द्वारे को।' मैया की सी सोच कछु मटकी उतारे को न, गोरस के ढारे को न चीर भीरि द्वारे को। सहै दुख भारी गहै डगर हमारी मांझ, नयर हमारे ग्वाल वगर हमारे को।।' इस कवित्त मे शब्दो की योजना अत्यन्त भावपूर्ण है। 'नचैया' शब्द आत्मीयता का सूचक है। 'कान्ह भरा वस वांसुरी के अब कौन सखी हमको चहि है। निसद्योस रहे सग-साथ लगी यह सौतिन तापन क्यों सहि है। जिन मोहि लियों मनमोहन को रसखानि सदा हमको दहि है। मिलि आयो सबै सखी' भागि चले अब तो ब्रज मे वंसुरी रहि है ॥' इस सवैये मे वांसुरी के प्रति गोपियो का सपत्नी-भाव व्यंजित है। इसमे 'कौन' शब्द कृष्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है जो अत्यन्त आत्मीयता का सूचक है। 'मनमोहन' शब्द का प्रयोग भी साभिप्राय है, इससे वांसुरी की महत्ता सूचित होती है, क्योंकि जो कृष्ण सबका मन मोहने के कारण मनमोहन बने हुए है, वे स्वयं वांसुरी द्वारा मोहित कर लिये गए है। 'मिलि आयो सबी' मे सभी सखियो के दुख की तथा समान दुख होने से उनकी एकता की व्यंजना होती है। 'कल काननि कु डल मोरपखा उर पै वनमाल बिराजति है। मुरली कर मैं अधरा मुसकानि-तरग महाछवि छाजति है। रसखानि लखें तन पीत पटा सत दामिनि की दुति लाजति है। वहि बांसुरी की धुनि कानि परें कुल-कानि हियो तजि भाजति है॥' इसमे 'वहि' शब्द का प्रयोग बांसुरी के उन प्रभावो की ओर संकेत करता है जिनसे प्रभावित होकर गोपियाँ अपने कुल की लाज छोड़कर कृष्ण के आगे पीछे दौड़ने लगती हैं। शब्द-योजना के द्वारा वर्ण्य वस्तु का चित्र प्रस्तुत करने मे भी रसखान सिद्धहस्त दिखाई पडते है। चित्रात्मकता का यह उदाहरण देखिए— 'जल की न घट परै पग की न पग घरै, घर की न कछु करै बैठी भरै सांमु री।