रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: १० : रसखान की भाषा भाषा भावो की अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। जो कवि जितना अधिक समर्थ होता है, उतना ही अधिक उसका भाषा पर अधिकार होता है। शब्द, अलकार, गुण, छद, लोकोक्ति और मुहावरे भाषा के प्राणदायक अग होते है। अत किसी कवि की भाषा की समीक्षा करने के लिए इन अंगो का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। रसखान की भाषा का विवेचन भी इसी आधार पर करना उचित है। शब्द-योजना यह सच है कि शब्द-समूह से भाषा का निर्माण होता है, पर प्रत्येक शब्द-समूह सफल एव प्रभावशाली भाषा को जन्म नही दे सकता। सफल भाषा के लिए भावानुसारिणी शब्द-योजना की सयोजना भी आवश्यक है। जहाँ तक शब्द-योजना का प्रश्न है, रसखान इस कसौटी पर खरे उतरते है। इनका शब्द-चयन अभीप्सित भावो को व्यक्त करने मे पूर्णतया समर्थ एव सफल है। यथा — ‘बात सुनी न कहूँ हरि की, न कहूँ हरि सो मुख बोल हँसी है। काल्हि ही गोरस बेचन कौ निकसी ब्रजवासिनि बीच सखी है। आजु ही वारक ‘लेहु दही’ कहिकै कछु, नैनन मै बिहँसी है। बैरिनि बाहि भई मुसकानि जुवा रसखान के प्रान बसी है ॥’ यहाँ पर ‘बैरिनि’ शब्द का प्रयोग अत्यन्त सार्थक एव भावपूर्ण है। इस शब्द से आक्रोश और आत्मीयता दो विरोधी भाव परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हो गये है। ‘अत मे न लयौ माही गाँवरे को जायौ, माई बापरे जिवायौ प्याइ दूध वारे-वारे को। १२६