रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १३१ एकै सुनि लोट गई एकै लोट-पोट भई, एकनि के दृगनि निकसि आए आँसु री। कहै रसखानि सो सबै ब्रज-बनिता बधि, बधिक कहाय हाय भई कुल हाँसु री। करिये उपाय बाँस डारियै कटाय, नाहि उपजैगौ बाँस नाहि वाजे फेरि बाँसुरी॥' रसखान की शब्द-योजना भावाभिव्यक्ति मे पूर्णतया समर्थ एव सफल है। साग रूपक की योजना प्रस्तुत करते समय प्रायः दुरूहता आ जाती है, पर रसखान के काव्य मे यह दोष भी दिखाई नहीं देता। वर्षा-विषयक यह सांग रूपक देखिए— 'दमकै रवि कुंडल दामिनि से धुरवा जिमि गोरज राजति है। मुकताहल-वारन गोपन के सु तौ बूँदन की छवि छाजत है। ब्रजबाल नदी उमही रसखानि मयकवधू-दुति लाजत है। यह आवन श्री मनभावन की बरखा जिमि आज बिराजत है॥' संगीतात्मकता भी रसखान की शब्द योजना की एक प्रमुख विशेषता है। प्रत्येक शब्द अपने स्थान पर इस प्रकार बिठाया गया है कि क्या मजाल, कही भी संगीतात्मकता को क्षति पहुँचे अथवा जिह्वा तथा स्वर की गति मे बाधा पडे। रसखान का समूचा काव्य इसका उदाहरण है, फिर भी दो सवैये प्रस्तुत हैं— १ 'नद को 'दन है दुसकदन प्रेम के फदन बाँधि लई हौ। एक दिना ब्रजराज के मदिर मेरी अली इक बार भई हौ। हेर्यौ लला ललचाइ कै मोहन जोहन की चकडोर पई हौ। दौरी फिरौ दृग डोरनि मैं हिय मै अनुराग की वेलि बई हौ॥' २. 'दृग दूने खिचे रहे कानन लौ लट आनन पै लहराइ रही। छकि छैल छबीली घटा लहराइ कै कौतुक कोटि दिखाइ रही। झुकि भूमि झमाकनि चूमि भ्रमी चहि चाँदनी चंद चुराइ रही। मन पाइ रही रसखानि महा छवि मोहन की तरसाइ रही॥' इस विवेचन के उपरात यह कहना अन्यथा न होगा कि रसखान की शब्द-योजना भावानुसारिणी, भावाभिव्यजक एव सफल है।