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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१३४ रसखान-ग्रन्थावली वीप्सा- 'तै न लख्यौ जब कुँजनि ते बनिके निकस्यौ भटक्यौ मटक्यौ री । सोहत कैसो हरा टटक्यौ अरु कैसो किरीट लसै लटक्यौ री । को रसखानि फिरै भटक्यौ हटक्यौ ब्रजलोग भिरै भटक्यौ री । रूप सबै हरि या नट को हियरे अटक्यौ अटक्यौ अटक्यौ री ।' श्लेष— 'स्याम सघन घन घेरि कै, रस वरस्यौ रसखानि । भई दिमानी फनि करि, प्रेम मद्य मन मानि ।' वक्रोक्ति— 'कौन ठगौरी भरी हरि आजु बजाई है बाँसुरिया रंग-भीनी । तान सुनी जिनही तिनही तबही तित लाज विदा करि दीनी । घूमे घरी घरी नन्द के द्वार नवीनी कहा कहूँ बाल प्रवीनी । या ब्रजमण्डल मे रसखानि सु कौन पटू जु लटू नहिं कीनी ।' रसखान द्वारा प्रयुक्त शब्दालंकार केवल चमत्कारक नही, जैसा कि प्रायः शब्दालंकारो के विषय मे कहा जाता है, वरन् ये भावो का उत्कर्ष करने वाले भी है। इनके द्वारा प्रयुक्त अनुप्रास शब्दो को संगीत प्रदान करके भावो को और भी अधिक ग्राह्य बना देते है। संगीतात्मकता अनुप्रास का गुण है और रसखान द्वारा प्रयुक्त अनुप्रास मे यह गुण प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है। यमक को क्लिष्टत्व का रूप माना जाता है। इसीलिए सुकर और दुष्कर भेद इसके किये गये है। लेकिन रसखान ने यमक का स्वाभाविक और भावपूर्ण प्रयोग करके यह सिद्ध कर दिया है कि यमक भी अन्य अलंकारो की भाँति प्रसादगुण-सम्पन्न हो सकता है। इसी प्रकार रसखान ने अन्य शब्दालंकारो का प्रयोग भी भावपूर्ण किया है। शब्दालंकारो की भाँति अर्थालंकारो का प्रयोग भी रसखान ने भावोत्कर्ष के लिए किया है। ये प्रयोग कवि की वाणी से स्वतः प्रस्फुटित हुए है, उसे इनके लिए कोई श्रम नही करना पड़ा है। यही कारण है कि जो भी अलंकार जहाँ प्रयुक्त हुआ है, वह अपने स्थान पर ठीक युक्ति- संगत और भावपूर्ण है। रसखान ने अनेक अर्थालंकारो का प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए कुछ अलंकारो के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते है।