रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग १३५ उपमा उपमान और उपमेय के सादृश्य वर्णन मे उपमालंकार होता है । रसखान के इस अलंकार का बहुत मात्रा मे और बहुत कुशलता से प्रयोग किया है । यथा— 'सुनियै सबकी कहिये न कछु रहिए इमि या भव-बागर मै । करिए व्रत नेम सच्चाई लिये जिनते तरियै भव-सागर मै । मिलियै सबसो दुरभाव बिना रहिए सत सग उजागर मै । रसखानि गुबिन्दहि यौ भजियै जिमि नागरि को चित्त गागर मै ॥' भगवद्-भजन के लिए नागरी के चित्र की एकाग्रता का सादृश्य दिख- लाया गया है । रूपक उपमेय मे उपमान के निषेध रहित आरोप को रूपक अलंकार कहते है । इसके मुख्यतया दो भेद है—सांग रूपक और निरंग रूपक । जहाँ उपमेय अवयवो के सहित उपमान के अवयवो का आरोप किया जाता है, वहाँ साग अथवा सावयव रूपक होता है और जहाँ अवयवो से रहित उपमान का उपमेय मे आरोप किया जाता है वहाँ निरंग अथवा निरवयव रूपक अलंकार होता है । रसखान ने इस अलंकार का भी प्रचुर मात्रा मे प्रयोग किया है । यथा— 'अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है । सखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाठन खोलत है । सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुजनि कुंजनि डोलत है । रसखानि लखे मन बूडि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है ।' यहाँ सौन्दर्य पर सागर का आरोप किया गया है, पर अवयवों का उल्लेख नही अत यहाँ निरंग रूपक हैं । उत्प्रेक्षा जहाँ प्रस्तुत की—उपमेय की—अप्रस्तुत रूप मे—उपमान रूप मे—सभा- वना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । इस अलंकार के प्रयोग से भावों में प्रभावशीलता आती है । अत. रसखान ने उपमा और रूपक की भाँति इस