रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ रसखान-ग्रन्थावली अलंकार का प्रयोग भी बहुलता से किया है। यथा— 'सांझ समै जिहि देखति ही तिहि पेखन कौ मन भीं ललके री । ऊँची अटान चढी ब्रजवाम सुलाज सनेह दुरैं उभकै री । गोधन धूरि की धूधरि मै तिनकी छवि यौं रसखान तकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानी धुँवा-लपटी लपटैं लपकै री ॥' यहाँ गोरज से धूसरित कृष्ण की दृष्टि मे आग के पहाड़ मे बुझकर उठते हुए धुँए के वादल की संभावना की गई है, अत उत्प्रेक्षा अलंकार हैं । अतिशयोक्ति लोक-मर्यादा के विरुद्ध वर्णन करने को—प्रस्तुत को वढा-चढाकर कहने को—अतिशयोक्ति अलंकार कहते हे । रसखान ने इसका भी सफल प्रयोग किया है— "या छवि पै रसखानि अब, वारौं कोटि मनोज । जाकी उपमा कविन नहिं पाई रहे सु खोज ॥" कृष्ण छवि की उपमा अभी तक कवियो को नही मिली है । वे अभी तक पूर्ण परिश्रम के साथ उस उपमा को खोज रहे हे । यह कथन प्रस्तुत को वढ़ा- चढ़ाकर कहने का द्योतक है । अत यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है । विरोधाभास जहाँ कथन मे विरोध का आभास हो, पर वास्तव मे विरोध न हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है । रसखान ने इसका कुशलता से प्रयोग किया है । यथा— 'संकर से सुर जाहि जपें चतुरानन ध्यानन धैर्य वढ़ावैं । नैक हिये जिहि आनन ही जड मूढ महा रसखानि कहावै । जा पर देव अदेव-भू अंगना वारत आनन आनन पावैं । ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं ।' इस सवैये की तीसरी पंक्ति मे प्रयुक्त—वारत आनन आनन पावैं' में विरोधाभास अलंकार है । समाधि जहाँ अचानक और कारणों के आ पड़ने से काम सुगम हो जाये, हाँ समाधि अलंकार होता है । इसे समाहित अलंकार भी कहते हैं । रसखान ने