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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग १३७ इस अलंकार का अधिक प्रयोग नही किया, परन्तु जो उदाहरण है वे पूर्णतया प्रभावपूर्ण है । यथा— 'कस कुढ्यौ सुनि बानि अकास की ज्यावनहारहि मारन धायौ । भादव साँवरी आठई को रसखानि महा प्रभु देवकी जायौ । रैनि अँवेरी मैं लै वसुदेव महावन मै अरगै धरि आयौ । काहु न भौ जुग जागत पायौ सो राति जसोमति सोवत पायौ ।' जिस कृष्ण को योगी भी अपनी जागृत अवस्था मे प्राप्त नही कर सकते, वही यशोदा को आसानी से प्राप्त हो गया । अतः यहाँ समाधि अलकार है । उल्लेख— जहाँ एक ही वर्णनीय विषय का निमित्त भेद से अनेक प्रकार का वर्णन हो, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । निम्नलिखित सवैये मे कृष्ण के अनेक रूपो का वर्णन है— 'वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत है रैन-दिन, सदा शिव सदा ही धरत ध्यान गाढै है । वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक, जोगी जती ह्वै कै सीत सतयौ अग डाढै है । वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्राननि के, जाके अभिलेख लाख लाख भाँति बाढै है । जसुधा के आगे वसुधा के मान मोचन पै, तामरस-लोचन खरोचन को ठाढै है ॥' अत्युक्ति संपत्ति, सौंदर्य, शौर्य, औदार्य सौकुमार्य आदि गुणो के मिथ्या वर्णन को अत्युक्ति अलंकार कहते है । रसखान ने कृष्ण प्रीति के प्रतिपादन मे इस अल- कार का प्रयोग किया है । यथा— 'कंचन-मंदिर ऊँचे बनाइ कै मानिक लाइ सदा झलकैयत । प्रात ही ते सदा सगरी नगरी नग मोतिन ही की तुलानि तुलैयत । जदपि दीन प्रजान प्रजापति की प्रभुता मघवा ललचैयत । ऐसे भये तो कहा रसखानि जौ सावरे ग्वार सों नेहन लैयत ।' इस सवैये में कृष्ण की प्रीति का बढा-चढाकर वर्णन करने के कारण अत्युक्ति अलंकार है ।